जानिए याहू की ऐसी 7 गलतियां जिससे वह इन्टरनेट की दुनिया पर पिछड़ गया.

Yahoo ne ki yeh mistakes jiski wajah se vah pichhad gya.

किसी जमाने में इंटरनेट की दुनिया में बड़ा नाम रहा याहू बिखरने जा रहा है। लेकिन इस तरह बिखरेगा, ऐसा तो उसने भी नहीं सोचा था। शेयरहोल्डर नाखुश हैं, अपने इंटरनेट बिजनस को अपने हाथों से बिखेरने की मजबूरी आ फंसी है। ऐसी कौन-सी 7 बड़ी गलतियां की याहू ने जिसका नतीजा वह आज भुगत रहा है? जानिए कैसे याहू ने की ऐसी गलतियां जिससे वह इन्टरनेट की दुनिया में काफी पिछड़ गया…

1. दो बार गूगल को न खरीदना और सर्च की अहमियत न समझना

1997 में याहू ने सिर्फ 1 मिलियन डॉलर में गूगल को खरीदने की पेशकश ठुकरा दी। कारण? डेविड ए वाइज़ की द गूगल स्टोरी के मुताबिक याहू अपनी वेबसाइटों से ट्रैफिक डायरेक्ट नहीं करना चाहता था।

याहू ने इसे इसलिए रिजेक्ट कर दिया क्योंकि कम्पनी चाहती थी कि यूजर याहू पर ज्यादा वक्त बिताएं। गूगल सर्च इंजन को इस तरह तैयार किया गया था कि वह लोगों के सवालों का तुरंत जवाब देकर उन्हें संबंधित वेबसाइटों पर भेज दे। याहू की डायरेक्टरी सवालों के जवाब भी देती थीं और लोगों को याहू साइटों से जोड़े भी रखती थीं, जहां वे शॉपिंग कर सकते थे, ऐड देख सकते थे, ईमेल देख सकते थे, गेम्स खेल सकते थे और ज्यादा पैसा और वक्त गुजार सकते थे।

5 सालों बाद, याहू के पास गूगल को खरीदने का एक और मौका आया। इस बार याहू अपने सर्च इंजन को पावर करने के लिए पहले ही गूगल की टेक्नॉलजी का इस्तेमाल कर रहा था। याहू के तात्कालिक सीईओ टेरी सीमेल ने गूगल को 3 मिलियन डॉलर में खरीदने की कोशिश की, जबकि सलाहकारों ने चेताया था कि कम्पनी की कीमत कम से कम 5 बिलियन डॉलर है। 2007 की वायर्ड की खबर के मुताबिक, सीमेल ने कहा था, ‘5 बिलियन डॉलर, 7 बिलियन, 10 बिलियन। मुझे नहीं पता कि उनकी कीमत क्या है और तुम्हें भी नहीं पता है… हम ऐसा हरगिज नहीं करने वाले।’ सीमेल को बाद में इस फैसले पर पछताना पड़ा।

गूगल से उबरने के लिए याहू ने कई प्रॉपर्टी खरीदीं जो कि 2004 में हुआ। अंत में, गूगल बचा और याहू डूब गया।


2. फेसबुक को हाथ से जाने देना

फेसबुक की भी अपनी कहानी है। इस कम्पनी को गूगल, वायाकॉम और याहू के साथ करीब 11 ऑफर आए मर्जिंग के। 2006 में, फेसबुक के इनवेस्टर इसे याहू को बेचने के लिए काफी उतावले थे। लेकिन स्टॉक गिरे और 1 बिलियन डॉलर की डील 875 मिलियन डॉलर की बनकर रह गई और मार्क जकरबर्ग ने डील से हाथ खींच लिया।


3. 2008 में माइक्रोसॉफ्ट का ऑफर ठुकराना

2008 में माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ स्टीव बॉलमर ने याहू को खरीदने की बहुत कोशिश की जो कि सर्च इंजनों की रेस में दूसरे नंबर पर जमा हुआ था। उस साल फरवरी में, याहू के बोर्ड ने तय किया कि माइक्रोसॉफ्ट का 44 बिलियन डॉलर का ऑफर ‘बहुत कम’ था। न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक, याहू, ‘नहीं मानता कि उसका बिजनस गिर रहा है’।

लेकिन याहू ने अगले साल माइक्रोसॉफ्ट के साथ अपने घरेलू सर्च को माइक्रोसॉफ्ट के बिंग से बदलने का सौदा कर लिया।


4. फ्लिकर को न रख पाना

अगर आप इंटरनेट पर फोटो शेयर करने के शौकीन रहे हैं तो आपको फ्लिकर जरूर याद होगा। फेसबुक के आने से पहले, यह फोटो शेयरिंग का मशहूर ऑनलाइन ऐप था। क्या हुआ? याहू ने अपनी कॉरपोरेट बकवास में इसे खत्म कर दिया और अपने सोशल नेटवर्क फ्लिकर को डुबो दिया। गिज्मोडो पर मैट होनन की रिपोर्ट में लिखा है, ‘यही कारण है कि हमने फ्लिकर खरीदा-कम्युनिटी नहीं। हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। फ्लिकर को खरीदने के पीछे थिअरी सोशल कनेक्शन बढ़ाने की नहीं थी, बल्कि इमेज इंडेक्स से पैसा बनाने की थी। इसमें सोशल कम्युनिटीज या सोशल नेटवर्किंग से संबंधित कुछ था ही नहीं। यूजरों से इसका कोई लेना देना नहीं था।’

दिक्कत यही थी। उस वक्त, वेब तेजी से सोशल हो रहा था और उस रेस में फ्लिकर सबसे आगे था। इसका वास्ता ग्रुप्स और कॉमेंट्स से और लोगों को कॉन्टैक्ट, दोस्त या परिवार के तौर पर पहचानने से ही था। लेकिन याहू के लिए, यह सिर्फ एक बेकार डेटाबेस ही था।


5. खुद को टेक कम्पनी न मानना

याहू कभी तय नहीं कर पाया कि वह एक मीडिया कम्पनी है या एक टेक कम्पनी। कम्प्यूटर सायेंटिस्ट पॉल ग्राहम बताते हैं कि याहू गूगल या माइक्रोसॉफ्ट के मुकाबले इतनी अजीब टेक कम्पनी कैसे बन गया।

कम्पनी दरअसल, सॉफ्टवेयर से नहीं बल्कि ऐड से कमा रही थी। इसलिए उसे लगता था कि वह एक मीडिया कम्पनी है, जबकि उसकी कार्यशैली टेक कम्पनी जैसी थी। ग्राहम यह भी कहते हैं कि शुरुआती ,सालों में याहू को डर था कि अगर वह नेटस्केप के रास्ते चला तो माइक्रोसॉफ्ट उसे कुचल डालेगा, और वह गूगल जैसा स्टार्टअप कल्चर हासिल करने में भी असफल हो गया।


6. टम्बलर, भविष्य में होने वाला नुकसान?

याहू का टम्बलर के लिए मैनेजमेंट उसी रास्ते चल रहा है जिसपर फ्लिकर था। चूंकि याहू ने फ्लिकर को फटॉग्रफी ड्रिवन सोशल नेटवर्क बनाकर उसे खराब कर दिया था, इसलिए मौजूदा सीईओ मरिसा मेयर ने अपने सोशल नेटवर्क को टम्ब्लर के साथ जोड़कर 2013 में उतार दिया जो अब भी प्रॉफिट नहीं कमा पा रहा है।

याहू ने डील होते ही इस माइक्रोब्लॉगिंग प्लैटफॉर्म पर ऐड देना शुरू कर दिया। इस साल अप्रैल में टम्बलर याहू की ज़ज में आया और उसके रीडिजाइन संबंधी मसलों से यूजर नाराज होने लगे। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो जियोसिटीज और फ्लिकर की तरह टम्बलर भी याहू का शिकार बन जाएगा। क्या पता क्या होता अगर फेसबुक या गूगल जैसे जायंट याहू के हाथों में पड़ जाते।


7. नहीं चला रीवैम्प

एक्स-गूगल कर्मचारी मरिसा मेयर के नेतृत्व में कम्पनी को पूरी तरह से रीवैम्प करने का आइडिया अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं ला पाया है। अब तक सिर्फ टम्बलर का अधिकरण हो सका है। ऐसा नहीं है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, ( माइक्रोसॉफ्ट में सत्य नडेला के आने के बाद के बदलाव ही देख लें) लेकिन मेयर का कार्यकाल काफी मुश्किलों से भरा रहा है और अब तो कम्पनी के भविष्य पर ही सवाल उठ गए हैं।

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