महाशिवरात्रि की व्रत कथा और इसका महत्व और कैसे मनाना चाहिए?

महाशिवरात्रि का त्यौहार हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखता हैं। महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव  से जुड़ा हुआ हैं। यह हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष के त्रयोदशी/चतुर्दशी के दिन मनाया जाता हैं। वैसे तो शिवरात्री हर महीने आती हैं, लेकिन फाल्गुन माह में आने वाली शिवरात्री ही महाशिवरात्रि हैं। इस दिन लोग भगवान शिव की पूजा करते हैं और उपवास रख कर महाशिवरात्रि का व्रत करते हैं।

महाशिवरात्रि का व्रत कैसे करे और इसका क्या महत्व हैं।

महाशिवरात्रि का त्यौहार इसलिए मनाया जाता हैं क्योंकि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यानी की शिवरात्री मनाने का कारण इस दिन शिव विवाह को माना जाता हैं। इसके अलावा फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि भगवान शिव का अति प्रिय दिन हैं। इसके अलावा यह भी माना जाता हैं की जब समुन्द्र मंथन हुआ था तो इसी दिन सबसे पहले समुन्द्र मंथन के दौरान कालकेतु नाम का विष निकला था। भगवान शिव ने पुरे ब्रह्मांड की रक्षा के लिए वह भयंकर विष को पी लिया और इसे अपने गले में रोक लिया। जिसके कारण भगवान शिव का गला नीले रंग का हो गया, और उसी दिन से भगवान शंकर को नीलकंठ महादेव के नाम से पुकारा जाने लगा।

महाशिवरात्रि की व्रत कथा :-

प्राचीन काल में एक शिकारी रहता था जो शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। महाशिवरात्रि के दिन वह शिकार करने के लिए जंगल में गया। सारा दिन जंगल में गुजारने के बाद उसे कोई भी शिकार नहीं मिला। अंत में वह एक तालाब के पास आ गया और पुरे दिन वह भूखा-प्यासा रहा। तालाब पर जाकर वह एक बेल के वृक्ष पर चढ़ गया और सोचने लगा की कोई न कोई जानवर तालाब पर पानी पीने के लिए जरूर आएगा।

जब शिकारी बेल के पेड़ पर चढ़ रहा था तो उस पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था। जो की बिल्व के पत्तों के कारण ढका हुआ था, जिसे शिकारी देख नहीं पाया। पेड़ पर चढ़ने के दौरान कुछ बेलपत्र शिकारी के हाथ से टूटकर शिवलिंग पर जा गिरे। और अनजाने में ही शिवलिंग पर वह शिकारी बेलपत्र अर्पित करता चला गया। वह शिकार की प्रतीक्षा में बेलपत्र को तोड़ के नीचे फ़ेंक रहा था, जो शिवलिंग पर अर्पित होते चले जा रहे थे। शिकारी भी भूखा प्यासा था, जिससे वह अजनाने में ही शिवरात्रि के व्रत का पालन कर रहा था।

शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना

रात का पहला पहर बीतने पर एक गर्भवती हिरणी तालाब पर पानी पीने के लिए आई। शिकारी ने जैसी ही हिरणी को देखा तो उसने अपने धनुष पर तीर चढ़ा लिए। ज्यों ही उसने अपने बाण को खीचा, तभी हिरणी शिकारी से बोली, “शिकारी मुझे मत मारों, मैं गर्भवती हूँ और जल्द ही प्रसव करने वाली हूँ, तुम मेरे साथ मेरे बच्चे की भी हत्या कर दोगे। एक ही बार में दो जीवों की हत्या करना ठीक नहीं हैं। मैं शीघ्र ही बच्चे को जन्म देकर वापिस आ जाउंगी और फिर तुम मेरे प्राण निकाल लेना।“

शिवलिंग पर बिल्वपत्र चढ़ाने के कारण क्रूर शिकारी का ह्रदय पुण्य की प्राप्ति से कुछ दयालु हो गया था। उसे हिरणी बात सच लगी और शिकारी ने उसे जाने दिया। कुछ समय के बाद एक और हिरणी तालाब के पास से गुजरी। तभी शिकारी ने उसे मारने के लिए धनुष पर बाण चढ़ाया, तो वह हिरणी शिकारी से कहने लगी की, “कृपया करके वह उसे न मारे, वह अपने पति को ढूंढ रही हैं। अपने पती से मिलने के बाद वह शीघ्र ही शिकारी के पास आ जाएगी।“ इस बार भी शिकारी ने इस दूसरी मृगी को जाने दिया।

शिकारी शिकार की प्रतीक्षा में बेलपत्र को तोड़ तोड़ करके शिवलिंग पर अनजाने में चढ़ाता रहा। तभी रात्री का तीसरा पहर बीत रहा था की एक और हिरणी अपने बच्चों के साथ वहां से गुजर रही थी। शिकारी इस बार खुश हो गया और उसने जैसे ही धनुष पर बाण को चढ़ाया तो हिरणी ने शिकारी से बिनती की वह अपने बच्चों को इनके पिता के पास छोड़ कर वापिस आ जाएगी। शिकारी यह सुनकर हंसने लगा और बोला, “क्या मैं इतना ज्यादा मुर्ख हूँ की हाथ आये शिकार को ऐसे ही जाने दूं, पहले भी मैंने 2 बार शिकार को जाने दिया हैं, मेरे बच्चे भूखे प्यासे हैं और भूख से तड़प रहे होंगे।“

Mahashivratri Vrat Katha in Hindi.

इतना सुनते ही हिरणी ने उत्तर दिया की ,”जैसे तुम्हे अपने बच्चों की ममता सता रही हैं, वैसे ही मुझे भी अपने बच्चों की ममता सता रही हैं। मैं तुमसे कुछ समय के लिए जीवनदान मांग रही हूँ, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर, जल्द ही वापिस आ जाउंगी और तब तुम मुझे मारकर अपना और अपने बच्चों का पेट भर लेना, मैं तुमसे यह वादा करती हूँ।“

शिकारी को इस बार भी दया आ गयी और उसने हिरणी और उसके बच्चो को जाने दिया। शिकार न मिलने के अभाव में शिकारी फिर से बेलपत्र को तोड़ तोड़ कर निचे जमीन पर फेंकने लगा और वह सभी बिल्वपत्र शिवलिंग पर अर्पण होने लगे। कुछ देर के पश्चात एक हिरण तालाब की ओर आया। शिकारी ने इस बार ठान लिया की वह इस हिरण का शिकार जरूर करेगा।

शिकारी को देखते ही हिरन बोलने लगा की, “हे शिकारी, अगर इससे पहले यहाँ आने वाली तीन हिरणियों और छोटे छोटे बच्चों को तुमने मार दिया हैं तो बिना देर किये तुम मेरे प्राण ले लो। जिससे उनके वियोग में मुझे दुःख न सहना पड़े। मैं उन तीनों हिरणियों का पति हूँ। अगर तुमने उन्हें जीवनदान दिया तो मुझे कुछ क्षण के लिए जीवनदान दो। मैं तुम्हे वचन देता हूँ, की अपने परिवार से मिलने के बाद मैं तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगा। तब तुम मुझे मार देना।“

शिवरात्री के उपवास, व्रत और शिवलिंग पर बिल्वपत्र के अर्पण से निर्दयी शिकारी का ह्रदय कोमल और निर्मल हो चूका था। उसने हिरण को भी जाने दिया। उसका हृदय भगवान शिव की कृपा से अब करुणा से भर चूका था। उसने अपने जीवनभर में किये गये कर्मों को याद करके पश्चाताप किया।

अब रात्री का अंतिम पहर आ चूका था, तभी हिरण अपने परिवार के समेत शिकारी के सामने आ गया। शिकारी ने जब जंगली पशुओं की उनकी सत्यता, वचनबद्धता और सामूहिक परिवारिक प्रेम को देखा तो उसे आत्मग्लानी महसूस हुई। उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे। शिकारी ने हिरण और उसके परिवार को नहीं मारा। तभी उस शिवलिंग से भगवान शिव प्रगट हुए और शिकारी भगवान शिव को देख कर काफी प्रसन्न हुआ और उनके चरणों में गिर गया। भगवान शिव ने तब शिकारी को मोक्ष प्रप्ति का वरदान दिया। इसी के साथ मृग परिवार को भी मोक्ष की प्राप्ति हुई।

महाशिवरात्रि का व्रत करने की विधि :-

महाशिवरात्रि के दिन सुबह उठते ही सबसे पहले स्नान करले। फिर शिव मंदिर जाये और शिवलिंग को जल से स्नान करवाए। शिवलिंग को पानी, शहद और दूध से स्नान करवाए। शिवलिंग को स्नान करवाने के बाद उसपर बेलपत्र को अर्पण करे। बेलपत्र की पत्तियों को शिवलिंग पर चढ़ाने से पहले यह सुनिश्चित करले की बेलपत्र कंही से कटे या फटे हुए न हो। बेलपत्र को चढ़ाने के बाद शिवलिंग पर जल अर्पित करे। फिर आप भगवान शिव को बेर या फल का भोग लगाए। आप चाहे तो चन्दन और कुमकुम से शिवलिंग का श्रृंगार कर सकते हैं।

भगवान शिव को आप महाशिवरात्रि के दिन दूध से बने पदार्थ जैसे की खीर, दही आदि का भोग लगा सकते हैं। इसके अलावा भांग का भी भोग लगा सकते हैं। प्रभु शिव को भोग लगाने के बाद “ॐ नमः शिवाय” का जाप करे। इसके अलावा भोलेनाथ के अन्य मन्त्रों का भी जाप करते रहे।

ॐ नमः शिवाय

महाशिवरात्रि का व्रत सुबह से शुरू करके अगले दिन तक रखना चाहिए। यह दिन और रात्री का व्रत हैं। महाशिवरात्रि का व्रत का नियम बहुत ही आसान हैं। आप चाहे तो दिन भर निर्जला व्रत भी रख सकते हैं। जिसमे कुछ भी खाना या पीना नहीं चाहिए। या फिर आप ऐसा व्रत भी रख सकते हैं, जिसमे आप फलाहार का सेवन कर सकते हैं। कुट्टू से बने आटे की रोटी खा सकते हैं, दूध से बनी सामग्री खा सकते हैं और सेंधा नमक का भी सेवन कर सकते हैं। चाहे आप निर्जला उपवास रखे या फिर फलाहार का सेवन करके व्रत रखे, यह आपकी इच्छा पर निर्भर करता हैं।

रात्री के समय जागरण करे और रात भर भगवान शिव की कथाएँ और महाशिवरात्रि की व्रत कथा को सुनते रहे। पुरे रात भगवान भोलेनाथ के भजन सूने, उनके भक्तिगीत  गा कर गुणगान करे।

व्रत की समाप्ति करने के लिए अगले दिन की सुबह स्नान करने के बाद शिवलिंग को जल से स्नान करवाए। फिर पूजा आदि करके के बाद प्रसाद को ग्रहण करके, व्रत को तोड़े। इस तरह से आप महाशिवरात्रि के त्यौहार को मनाये।

महिलाओं के लिए विशेष लाभकारी हैं महाशिवरात्रि का व्रत :-

महाशिवरात्रि का व्रत करने के लिए किसी खास सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती हैं। भगवान शंकर इतने ज्यादा भोले हैं की वह सिर्फ जल और बेलपत्र के चढ़ावे से भी शिवभक्तों पर अपनी कृपा बरसाने लगते हैं। महाशिवरात्रि का व्रत महिलाओं के लिए विशेष रूप से लाभकारी हैं। ऐसा माना जाता हैं की कुंवारी कन्याएं महाशिवरात्रि के दिन उपवास रख कर भगवान शिव और माता पार्वती से मनचाहे वर (पति) की प्राप्ति कर सकती हैं।

महाशिवरात्रि के दिन ऐसी मान्यता भी हैं की ईश्वर मध्यरात्रि को मनुष्यों के काफी ज्यादा निकट आ जाते हैं। इसी लिए महाशिवरात्रि की रात को कई सारे लोग जागरण करते हैं।








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