मालपुआ और बटुक नाथ, जरूर पढ़े यह रोचक कहानी…

मालपुआ की कहानी, हिंदी में...

बटुक नाथ एक बार अपनी ससुराल को गए। वहॉं पर उनकी सास ने उनकी खूब खातिरदारी की। तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान बना कर उनकी सास ने उन्हें खिलाये। उनमे से एक पकवान ऐसा था जिसे खाकर बटुक नाथ बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी सास से पूछा ,“सासु माँ यह कौन सा व्यंजन है जो आपने अभी बनाया है? बहुत ही स्वादिष्ट है ?” उनकी सास ने जवाब दिया,“दामाद जी, इसे मालपुआ कहते है। ”

बटुक नाथ ने मन में ठानी की अब वह घर जाकर पत्नी से मालपुआ बनवा कर खाएंगे। दो-चार दिन बीत गए तो बटुक नाथ ससुराल से घर की ओर रवाना हुए। लेकिन उन्हें मालपुआ खाने का बड़ा मन था। कँही मालपुआ का नाम न वह भूल जाये इसलिए बटुक नाथ मालपुआ-मालपुआ रटते हुए चल पड़े।

रास्ते में कुछ नौज़वान चिड़िया पकड़ने के लिए जाल बिछाये हुए थे और उन्होंने कुछ दाना आदि डाल रखा था। बटुक नाथ मालपुआ-मालपुआ रटते हुए जा रहे थे , तभी उन नौजवानो ने उन्हें पकड़ लिया और मारने लगे। इस पर बटुक नाथ बोले,”भाई क्यों मार रहे हो मुझे। मैंने क्या किया है ?” नौजवान बोले ,”हमने चिड़िया पकड़ने के लिए जाल बिछाया था, तुम्हारे बड़बड़ाने की वजह से सभी चिड़िया भाग गयी। “

बटुक नाथ बोले “, भाई मैं अब क्या बोलू।” नौजवान बोले, “बोलो लगे रहो-लगे रहो।”

बटुक नाथ अब लगे रहो -लगे रहो  रटते हुए आगे बढ़ गए। रास्ते में दो औरतें झगड़ा कर रही थी। काफ़ी भीड़ जमा हुई थी, उसे बटुक नाथ देखने के लिए चले गए। बटुक नाथ वहां जाकर लगे रहो -लगे रहो रट रहे थे। भीड़ में से कुछ लोगो ने बटुक नाथ को बुरा -भला कहा , कुछ लोगो ने बटुक नाथ को समझाया ,“ऐसा नहीं कहते है, दो औरतें झगड़ रही है, तुम उनका झगड़ा नहीं सुलझा सकते तो कम से कम लगे रहो लगे रहो तो मत बोलो। ” इस पर बटुक नाथ बोले,”तो मैं क्या बोलू। ” लोगो ने कहा,”कहो अः यह नहीं चाहिए। “

बटुक नाथ अब “अः यह नहीं चाहिए” की रट लगाते चले जा रहे थे। तभी रास्ते में एक राजा की बहुत वर्षो बाद एक पुत्री हुई थी। वहां पर नगर के लोग इकट्ठे होकर राजा जी को बधाई दे रहे थे। बटुक नाथ वहां पर पहुँच गए और “अः यह नहीं चाहिए की रट लगाने लगे। इस पर वहां मौजूद लोगो ने बटुक नाथ को बुरा भला कहा और कहा, “हमारे महाराज की बहुत वर्षों के बाद एक कन्या हुयी है और तुम कहते हो अः यह नहीं चाहिए। ” बटुक नाथ बोले ,”तो मैं क्या बोलू। ” इस पर लोगो ने कहा ,”कहो बहुत अच्छा हुआ। “

अब बटुक नाथ “बहुत अच्छा हुआ ” रटते हुए जा रहे थे की एक जगह उन्होंने देखा की आग लगी हुई थी। बटुक नाथ वहां जाकर कहने लगे ,”बहुत अच्छा हुआ। ” इस पर लोग भड़क उठे, बटुक नाथ बोले , तो मैं क्या बोलू, आप लोग ही बताए। ” लोगो ने कहा ,”बताना क्या है , तेरा घर सामने है , अपने घर को जा। “

बटुक नाथ अब अपने घर को पहुँच गए। अब उन्हें ससुराल में बने उस स्वादिष्ट वयंजन खाने की तीव्र इच्छा हुई , लेकिन रास्ते में जो उनके साथ हुआ था इसी कारण वह उस वयंजन का नाम भूल गए थे। लेकिन वह अपनी पत्नी से बोले, “ससुराल में सासु माँ ने एक व्यंजन बना कर खिलाया था , तुम भी वही बना कर खिलाओ। ” पत्नी बोली ,“क्या बनाऊ, हलवा बनाऊ, गुजिया बनाऊ यां पकौड़े बनाऊ। ” बटुक नाथ बोले ,”नहीं यह नहीं , जो सासु माँ ने बनाया था वही व्यंजन बनाओ । “

बात आगे बढ़ती गयी , बटुक नाथ अपनी पत्नी को मारने लगे। पत्नी ने गुस्से में आकर कहा,” अब मैं मायके जा रही हूँ और माँ से पूछूंगी की क्या बना कर खिला दिया है तुमने ?”

बटुक नाथ रूठी पत्नी को मनाने के लिए उसके पीछे पीछे दौडे। रास्ते में जाकर वह क्षमा मांगने लगे। लेकिन पत्नी नहीं मान रही थी। तभी एक औरत उनके पास आई , बटुक नाथ की पत्नी को देखकर बोली ,“हाय राम तुम्हारा मुँह तो बिलकुल मालपूए जैसा लग रहा है। “

“हा हा यही व्यंजन सासु माँ ने मुझे बना कर खिलाया है , बस-बस यही है “, बटुक नाथ उत्साहित होकर बोले। इस पर पत्नी ने कहा ,”पहले नहीं बता सकते थे की मालपुआ बनाना है। “

“मैं भूल गया था। “,बटुक नाथ ने मुँह लटकाकर जवाब दिया।

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