योग क्या हैं और यह कितने प्रकार का होता हैं?

योग क्या हैं और यह कितने प्रकार का होता हैं?

शरीर और मन के संयोग को हम योग कह सकते हैं। योग एक ऐसा तरीका हैं जिसे मनुष्य की छुपी शक्तियों (Latent power ) का विकास किया जाता हैं। यह धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान और शारीरिक सभ्यताओं का मेल हैं। योग शरीर और आत्मा की जरूरतों को पूरा करने का एक उत्तम साधन हैं। मनुष्य के गुणों, शक्तियों के परस्पर मिलाप को योग कहा जाता हैं।

पतंजली ऋषि ने अष्टांग योग के कौन कौन से अंग बताये हैं?

शरीरीक तंदरुस्ती और मन की शांति के लिए पतंजली ऋषि ने जो तरीका बताया हैं उसे अष्टांगयोग कहा जाता हैं। इसके अंग इस प्रकार से हैं :-

1. यम (Restrain)
2. नियम (Observation)
3. आसन (Posture)
4. प्राणायाम (Regulation of breath and bio-energy)
5. प्रतिआहार (Abstraction)
6. धारणा (Concentration)
7. ध्यान (Meditation)
8. समाधि (Trance)

1) यम :- यह अनुशाशन के वह साधन हैं जो मनुष्य के मन से सम्बन्ध रखते हैं। इनके अभ्यास से मनुष्य अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, पवित्रता और त्याग सीखता हैं।

2) नियम :- नियम वह ढंग हैं, जो मनुष्य के शारीरिक अनुशाशन से सम्बंधित हैं। शरीर और मन की शुद्धि, संतोष, दृढ़ता और परमात्मा की आराधना की जाती हैं।

3) आसन :- मनुष्य के शरीर को ज्यादा से ज्यादा समय के लिए किसी खास स्तिथि में रखने को आसन कहा जाता हैं। उदाहरण के तौर अपर रीढ़ की हड्डी को बिलकुल सीधा रख कर पैरों को किसी खास दिशा में रख कर बैठने को पद्म आसन कहा जाता हैं।

4) प्राणायाम :- यह स्थिर जगह पर बैठ कर किसी खास विधि के द्वारा सांस को अन्दर ले जाना और बाहर निकालने की क्रिया को प्राणायाम कहते हैं।

5) प्रतिआहार :- प्रतिआहार का अर्थ हैं मन और इन्द्रियों को उनकी सम्बंधित क्रियाओं से हटा कर परमात्मा की ओर लगाना।

6) धारणा :- इस का अर्थ यह हैं मन को किसी खास इच्छुक विषय पर लगाना। इस तरह एक तरफ ध्यान लगाने से मनुष्य में एक महान शक्ति पैदा हो जाती हैं, जिससे मनुष्य की इच्छाएं पूरी होती रहती हैं।

7) ध्यान :- यह धारणा से और भी ज्यादा ऊँची अवस्था हैं, जिस में आदमी दुनियावीं उलझनों से ऊपर उठ जाता हैं और अपने आपमें अंतर-ध्यान हो जाता हैं।

8) समाधि :- इस अवस्था में मनुष्य की आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती हैं।




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