वो जानवर जो विलुप्त होने की कगार पर है.

वे जानवर जो विलुप्त होने की कगार पर हैं.

दुनिया में ऐसे कई जानवर हैं जिनके हमेशा के लिए मिट जाने का ख़तरा मंडरा रहा है. ऐसा ही जानवर है, वैक्विटा पॉरपॉइज़ या सुइंस.

डॉल्फ़िन और व्हेल की नस्ल के ये समुद्री जानवर अमरीका और मेक्सिको के समंदर से लगे इलाक़ों में पाए जाते हैं.

1997 में इनकी तादाद पांच सौ के आस-पास थी. 2008 में इन सुइंस की संख्या घटकर 245 रह गई.

आज कहा जा रहा है कि कैलिफ़ोर्निया की खाड़ी में महज़ 50 वैक्विटा पॉरपॉइज़ ही बची हैं.

डॉल्फ़िन की ये बहनें, कैलिफ़ोर्निया की खाड़ी में ही पाई जाती हैं. ये सेटासियन नस्ल के जानवर हैं.

इनमें व्हेलें, डॉल्फ़िन और दूसरी पॉरपॉइज़ आती हैं. अपने ग्रुप के ये सबसे छोटे स्तनपायी जीव हैं.

Whales

आजकल इन्हें बचाने के लिए मेक्सिको के कुछ लोग, इन समुद्री जानवरों की जासूसी करते हैं.

इससे ये पता लगाने की कोशिश की जाती है कि आख़िर समंदर में कितनी वैक्विटा पॉरपॉइज़ बची हैं.

अक्सर इन्हें डॉल्फ़िन समझ लिया जाता है. दोनों में ज़्यादा फ़र्क़ होता भी नहीं.

लेकिन डॉल्फ़िन के मुक़ाबले इनकी चोंच छोटी होती है. इनके और डॉल्फ़िन के दांतों में भी अंतर होता है.

इनका आकार भी डॉल्फ़िन के मुक़ाबले छोटा होता है.

दुनिया में सुइंस या पॉरपॉइज़ की छह नस्लें पाई जाती हैं. वैक्विटा पॉरपॉइज़ इनमें से सबसे छोटी होती है.

इनके तेज़ी से ख़ात्मे की सबसे बड़ी वजह है, रिहाइशी इलाक़ों में बड़े पैमाने पर मछलियों के पकड़ने का कारोबार.

Dolphin

होता ये है कि ये अक्सर मछली पकड़ने के जाल में फंसकर अपनी जान गंवा देती हैं.

जिस इलाक़े में वैक्विटा पॉरपॉइज़ पायी जाती हैं वहां पर मछलियां पकड़ने का काम ज़ोर-शोर से होता है.

मछलियों को पकड़ने के लिए जिलनेट नाम के जाल का ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से इस्तेमाल होता है.

इन्ही जालों की वजह से चीन की यांग्त्ज़ी नदी से डॉल्फ़िन का ख़ात्मा हो गया. आज यही ख़तरा वैक्विटा पॉरपॉइज़ पर मंडरा रहा है.

ये सुइंस, समंदर में तेज़ आवाज़ें निकालती हैं. आज इनकी आवाज़ की रिकॉर्डिंग करके इनकी तादाद का पता लगाने की कोशिश की जा रही है.

मेक्सिको के अमांडो यारामिलो लेगोरेटा काफ़ी दिनों से इस काम में लगे हैं.

उन्होंने 2011 से 2015 के बीच अपने साथियों की मदद से समंदर में इन वैक्विटा पॉरपॉइज़ की निगरानी की.

इनकी आवाज़ की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि इंसान के कान उसे सुन नहीं सकते.

इसलिए इन सुइंस की आवाज़ को मशीन के ज़रिए रिकॉर्ड किया जाता है.

फिर उन्हीं आंकड़ों की मदद से कैलिफ़ोर्निया की खाड़ी में सुइंस की तादाद का अंदाज़ा लगाया जाता है.

लेगोरेटा का कहना है कि पिछले चार सालों में इन सुइंस की आवाज़ में 34 फ़ीसद की गिरावट आई है.

लेगोरेटा के अलावा भी एक और पड़ताल से पता चला है कि इनकी तादाद महज़ पचास ही रह गई है.

अगर वैक्विटा पॉरपॉइज़ की इस नस्ल का ख़ात्मा होता है, तो इसके गंभीर नतीजे होंगे, क्योंकि आज की तारीख़ में इनके बचाव के लिए मछली मारने वालों को आर्थिक मदद मिलती है.

वैक्विटा पॉरपॉइज़ के ख़ात्मे के बाद उन्हें ये पैसे नहीं मिलेंगे. वो और ज़्यादा तादाद में मछलियां पकड़ने की कोशिश करेंगे.

These animals will not found in future.

इससे पूरे इलाक़े से ही मछलियों का ख़ात्मा होने का डर है.

मेक्सिको के योर्ग टॉर इन वैक्विटा पॉरपॉइज़ को बचाने की मुहिम से जुड़े हुए हैं.

वो कहते हैं कि प्रशासन इन सुइंस के ख़ात्मे के लिए क़रीब पंद्रह सौ मछुआरों को बार-बार ज़िम्मेदार बताता है. इससे वो लोग भी खीझ गए हैं.

योर्ग सलाह देते हैं कि मेक्सिको की सरकार को वैक्विटा पॉरपॉइज़ को बचाने के लिए देशव्यापी मुहिम छेड़नी चाहिए.

इसे देश की पहचान का मसला बताना चाहिए. तभी आम लोग, इस मुहिम को लेकर संजीदा होंगे.

मेक्सिको के राष्ट्रपति ने 2015 में वैक्विटा पॉरपॉइज को बचाने के लिए एक इमरजेंसी अभियान का एलान किया है.

पिछले साल से ही मछलियां पकड़ने के लिए जिलनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है.

इससे मछुआरों को होने वाले नुक़सान की भरपायी के लिए सरकार पैसे दे रही है.

हवाई सर्वे से पता चला है कि अमरीका की कोलोराडो नदी के डेल्टा में कुछ और सुइंस पायी गई है.

अब अगर सरकार की मुहिम रंग लाती है तो इस इलाक़े में वैक्विटा पॉरपॉइज़ की तादाद बढ़ने की उम्मीद है.

इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि जिलनेट का इस्तेमाल पूरी तरह बंद हो.

हालांकि सिर्फ़ वैक्विटा पॉरपॉइज़ से पूरी नस्ल को बचा पाना बहुत मुश्किल काम है.








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