बांस लगाये और धन कमाए.

बांस लगा कर करे कमाई

बहु-उपयोगी बाँस की विश्व में बढ़ती माँग को देखते हुए लगता है कि अब बाँस के दिन बहुर गये। बाँस किसानों और निवेशकों के लिये फायदे का सौदा है। बाँस सभी तरह की मिट्टी जिसमें नमी की पर्याप्त मात्रा हो जैसे दोमट, मुर्मीली, लाल-पीली, कंकरीली, पथरीली एवं काली मिट्टी आदि में आसानी से उगाया जा सकता है, । बाँस को गाँव में घर के सामने या पीछे, खेत या खलिहान में, खेत की मेढ़ पर, पहाड़ी या पथरीली भूमि पर आसानी से उगाया जा सकता है। बाँस के पौधे बीज, कटिंग (गन्ने की तरह बो कर) प्रयोगशाला में टिशूकल्चर तकनीक तथा कंद अर्थात रायजोम से उगाये जा सकते हैं। बाँस को वर्ष भर किसी भी समय, किसी भी प्रकार की मिट्टी में किसी भी प्रकार की सतह पर थोड़ी-सी नमी या पानी, हल्की छाया देकर उगाया जा सकता है।

अच्छी आमदनी

बाँस सतत राजस्व या पैसा देने वाली वनस्पति है। इसे खेतों में उगाकर कृषि से अधिक पैसा कमाया जा सकता है। एक हेक्टेयर अर्थात 2.5 एकड़ में 625 पौधे 4-4 मीटर की दूरी पर उगाकर पाँचवें वर्ष से 5 बाँस प्रति भिर्रा अर्थात 3125 बाँस प्रतिवर्ष उगाये जा सकते हैं। देशी बाँस 40 से 50 रुपये और कटंगा बाँस 100 से 125 रुपये प्रति बाँस की दर से विक्रय कर कम से कम डेढ़ लाख से 3-4 लाख रुपये तक प्रतिवर्ष कमाया जा सकता है। आठवें वर्ष से 10 बाँस प्रति भिर्रा या 6250 बाँस प्रति हेक्टेयर निकाला जा सकता है और इसे बेचकर लगभग 5 से 7 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष निरंतर आगे कमाया जा सकता है।

बाँस के साथ अन्य कृषि फसलों को (कृषि वानिकी मॉडल) पर पैदा किया जा सकता है। बाँस के साथ अदरक या हल्दी या आम हल्दी या सफेद मूसली या इसी तरह की अन्य फसलों को साथ-साथ उगाकर 20 से 50 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष अतिरिक्त कमाया जा सकता है।

कीट-नाशक की जरूरत नहीं

बाँस को उगाने के लिये किसी कीट-नाशक या फफूंदी-नाशक की आवश्यकता नहीं होती है। बाँस का पौधा भिर्रे के रूप में विकसित होकर भूमि संरक्षण का कार्य बहुत मुस्तैदी से करता है, मिट्टी को पकड़ कर रखता है और भूमि के कटाव को रोकता है। बाँस एक बार स्थापित हो जाने के बाद तब तक नहीं मरता, जब तक अपनी आयु पूरी न कर ले। बाँस की आयु 32 से 48 वर्ष तक मानी जाती है।

शिल्पकारों, उत्पादकों, उद्यमियों के लिये फायदा

बाँस से अनेक प्रकार की वस्तुएँ बनाकर विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा सकता है। इससे घर, छप्पर, चटाई, कुर्सी, टेबल, पंखा, हेण्डीक्राफ्ट की वस्तुएँ, प्लाई और अब तो ज्वेलरी भी बनाकर महिलाएँ इसका उपयोग कर रही हैं।

बाँस के टाइल्स का फर्श में उपयोग एक नई विधा है। बाँस के टाइल्स में रंग एवं विविधता किसी दोष के कारण नहीं, बल्कि इसकी सुंदरता एवं विशिष्टताओं के कारण है।

बाँस के रेशे दुर्गन्ध अवशोषक एवं छिद्रित होते हैं। बाँस के रेशे तापमान में बदलाव को सहन कर सकते हैं। बाँस जैविक रूप से 100 प्रतिशत सड़नशील (बायो-डिग्रेडेबल) होता है। बाँस के प्राकृतिक पोलेपन के कारण यह अधिकांश वाद्य-यंत्र बनाने में उपयोग होता है। बाँस के रेशे से बने वस्त्र एलर्जी रहित होते हैं।

निर्माताओं के लिये फायदा, फौलाद से भी मजबूत

बाँस बहुत हल्का एवं स्टील से अधिक Tensile शक्ति रखता है। बाँस की Tensile शक्ति 28 हजार पी.एस.आई. होती है। स्टील की यह शक्ति 24 हजार पी.एस.आई. होती है। बाँस की एक प्रजाति (Bambusa Vulgaris) पीले रंग की होती है, जिसे प्राय: बगीचे में सुंदरता बढ़ाने के लिये लगाया जाता है।

बाँस की 18-20 मीटर ऊँचाई पाने वाली प्रजातियाँ शहरों में ऊँचे भवनों के निर्माण में काम आती हैं। इनसे ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ भी बनायी जा सकती हैं। थॉमस एडिसन ने अपने स्वीमिंग पूल में बाँस की एक लेयर का सुदृढ़ीकरण में उपयोग किया था। स्वीमिंग पूल से फिर कभी पानी नहीं रिसा। बाँस से बने निर्माण (अधोसंरचना) भूकम्प-रोधी होते हैं। विश्व में एक अरब व्यक्ति बाँस से बने घरों में रहते हैं।

1500 प्रजाति

विश्व में बाँस की लगभग 1500 प्रजाति हैं। अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त कर उगाया जा सकता है। बाँस का एक भिर्रा 5 वर्ष में लगभग 200 बाँस देता है। बाँस एक बार स्थापित हो जाने के बाद मरता नहीं है, जब तक कि वह अपनी आयु पूरी न कर ले।

बाँस का करला (नया बाँस) बस्तर में बास्ता बनाकर खाया भी जाता है। वन क्षेत्रों में लंगूर, बंदर, सुअर एवं अन्य जानवर भी इसे खाते हैं। बाँस का बास्ता कृमि-नाशक होता है। बाँस कम कैलोरी का कम वसा युक्त भोजन है। बाँस भोजन की एक प्लेट दैनिक आवश्यकता की 10 प्रतिशत जरूरत पूरी करती है।

पर्यावरण रक्षक, कार्बन अवशोषक

बाँस अन्य पौधों की तुलना में पर्यावरण की अधिक सुरक्षा करता है। यह वायु-मण्डल से 66 प्रतिशत अधिक कार्बन डाई आक्साइड सोखता है और 66 प्रतिशत अधिक आक्सीजन वायु-मण्डल में छोड़ता है।

चीन में काले बाँस की जड़ों का उपयोग किडनी की बीमारी के उपचार में किया गया है। इमारती लकड़ी के स्थान पर बाँस का उपयोग करने से प्राकृतिक वनों को बचाया जा सकता है। बाँस की जड़ें भूमि एवं जल से प्रभावी रूप से धातुओं को अवशोषित कर प्रदूषण नियंत्रण करती हैं।

बाँस से प्राप्त कोशिका रस प्राकृतिक रेयॉन बनाने के काम आता है।

सभी के लिये लाभकारी

बाँस सभी वर्गों के लिये सर्वाधिक लाभकारी एवं उपयोगी प्रजाति है। बाँस से जुड़े सभी हितग्राहियों- किसान, बाँस शिल्पकार, फर्नीचर उत्पादक, बाँस उद्यमी, बाँस अधोसंरचना निर्माता आदि के लिये बाँस सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण उत्पाद है।

बाँस गरीबों की लकड़ी कही जाती है। पर अब इसके ये मायने बदलने लगे हैं। इसे हरे सोने की संज्ञा दी गयी है, जो मनुष्य के बचपन से लेकर मृत्यु बाद तक कभी पालने, कभी चारपाई, कभी कुर्सी-टेबल, कभी झूला, कभी बुढ़ापे की लाठी के रूप में और मृत्यु होने पर कपाल क्रिया में या शव लिटाने के काम आता है। बाँस सर्वाधिक उपयोग होने वाली वनस्पति है।

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