ओड़िसा और बंगाल दोनों ने रसगुल्ले पर किया था अपना दावा और अंत में जीत गया बंगाल।

 रसगुल्ले पर हुयी लड़ाई, 2 राज्यों का दावा रसगुल्ला उनकी देन हैं.

रसगुल्ला बहुत ही स्वादिष्ट मिठाई हैं और करोड़ो लोग रसगुल्ले के दीवाने हैं। लेकिन साल 2015 में भारत के 2 राज्यों ने रसगुल्ले पर अपना-अपना दावा पेश किया। यह दोनों राज्य थे बंगाल और ओड़िसा, जिनका यह कहना था की रसगुल्ले की खोज उनके यहाँ हुई हैं।

ओड़िसा और बंगाल दोनों ने यह माना की रसगुल्ला उनके राज्य की देन हैं। रसगुल्ले को लेकर दोनों राज्यों की लड़ाई काफी ज्यादा चर्चा का विषय बनी रही।

क्या था ओड़िसा का दावा :-

रसगुल्ले को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब साल 2015 में ओडिशा के विज्ञान व तकनीकी मंत्री प्रदीप कुमार पाणिग्र्रही ने यह कहा की रसगुल्ले का अविष्कार ओड़िसा में हुआ हैं। उन्होंने इसे भगवान जगन्नाथ के प्रसाद खीर मोहन के नाम से मशहूर होने की बात कही।

ओड़िसा ने रसगुल्ले पर अपना यह दवा पेश किया की भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के दौरान प्राचीन युग से रसगुल्ला प्रसाद के रूप में भक्तो को भेंट किया जाता रहा हैं। मन्दिर के सम्पर्क अधिकारी लक्ष्मीधर पूजापंडा का यह कहना था की रसगुल्ला 12 वीं सदी से ही पुरी में रथयात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा हैं। लेकिन इस दावे में दम इसलिए नहीं हैं क्योंकि भगवान श्री कृष्ण को लगाए जाने वाले छप्पन भोग में रसगुल्ले का कंही भी वर्णन नहीं किया गया हैं।

फूड हिस्टोरियन के.टी. आचार्य यह कहते हैं की “हिन्दू धर्म में पनीर बनाने पर पाबंधी थी। क्योंकि हिन्दू धर्म में दूध को फाड़ना पाप माना जाता था। क्योंकि हिन्दू धर्म में दूध काफी ज्यादा पवित्र माना गया हैं। इसलिए दूध से बनी इस प्रकार की मिठाई से भगवान का भोग लगाना नामुमकिन सी बात हैं।“

एक अन्य इतिहासकार चित्रा बनर्जी कहती हैं, “भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी जिनती भी कथाएँ मिलती हैं, उनमे दूध, घी, दही, माखन सबका उल्लेख्य मिलता हैं, लेकिन कंही भी छेने का उल्लेख नहीं हैं। यह तक की मध्यकालीन भारत में भी कंही भी छेने की जानकारी नहीं मिलती हैं। जबकि चैतन्य महाप्रभु मिठाई के शौक़ीन थे, लेकिन उनके समय में भी छेने का कोई भी वर्णन नहीं हैं। हाँ, मध्यकालीन के समय बंगाल में खोये से बने हुए संदेश का ज़िक्र किया गया हैं।“

इतिहासकार केटी आचार्य का यह कहना था की,” पुर्तगाली ताज़ा पनीर खाना पसंद करते थे। इसलिए वह दूध में एसिड डालकर इसे फाड़ते थे। पुर्तगालीयों को देखकर हिन्दुओं में दूध फाड़ने को लेकर कट्टरता कम हुई हो और धीरे-धीरे करके पनीर से रसगुल्ला बनाने की खोज की गयी हो।“

यह तो मालूम हो गया की 12वीं सदी में जगन्नाथ रथ यात्रा में रसगुल्ले की कहानी सच नहीं हैं।

बंगाल का दावा :-

ओड़िसा के दावे को लेकर बंगाल के खाद्य प्रसंस्करण मंत्री अब्दुर्रज्जाक मोल्ला ने कहा था की रसगुल्ले की खोज बंगाल में ही हुई हैं। 1868 में नविनचंद्र दास ने पहली बार रसगुल्ला बनाया था। उन्हें रसगुल्ले का आविष्कारक भी कहा जाता हैं।

वैसे ज्यादातर इतिहासकार ओड़िसा के दावे को गलत ही मानते रहे। क्योंकि ज्यादातर जानकारों का यह मानना था की नविनचन्द्र दास ही ऐसे शख्स थे, जिन्होंने रसगुल्ले को पुरे भारत में लोकप्रिय बनाया। और उन्होंने ने रसगुल्ले का आविष्कार किया।

दोनों राज्य कोर्ट तक जाने को हो गये थे तैयार :-

इस मामले को लेकर दोनों ही राज्य कोर्ट तक जाने के लिए तैयार हो गये थे। लेकिन जियोग्राफिकल इंडिकेशन के चेन्नई ऑफिस ने इस विवाद को सुलझाते हुए यह फैसला दिया की रसगुल्ले का जन्मदाता बंगाल ही हैं। बंगाल में ही रसगुल्ले का आविष्कार हुआ हैं। गौरतलब है कि जियोग्राफिकल इंडिकेशन एक तरह से इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी का फैसला करती है और ये बताती है कि कोई प्रोडक्ट्स किस इलाके, समुदाय या समाज का है।

कानूनी लड़ाई में जीत के साथ ही पश्चिम बंगाल को रसगुल्ले का ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआई पंजीकरण मिल गया है। अब पूरे विश्व में रसगुल्ला पश्चिम बंगाल के नाम से जाना जाएगा। बता दें कि किसी भी उत्पाद का जीआई पंजीकरण उसके स्थान विशेष की पहचान बताता है।



अगर लेख अच्छा लगा हो तो निचे सोशल मीडिया बटन से अपने दोस्तों में शेयर करना न भूले, क्योंकि आपका एक शेयर इस वेबसाइट को आगे जारी रखने के लिए हमें प्रेणना देगा...

इन्हें भी जरूर पढ़े...