मृत्यु के बाद क्या होता है, जानिए वो रहस्य जो स्वयं यमराज ने बताये है।

मौत के बाद क्या होता हैं?

मनुष्य के मन में मौत से जुड़े हुए सवाल अक्सर आते ही हैं। जैसे की ज्यादातर लोग यह जानना चाहते हैं की आखिर मरने के बाद क्या होता हैं? मृत्यु होने के बाद आत्मा शरीर को त्याग कर कहाँ जाती हैं? मौत के बाद आत्मा का क्या होता हैं? यानी की मृत्यु के बाद होने वाले रहस्यों को जानने के लिए इंसान हमेशा आतुर रहता हैं। यह बात शत प्रतिशत सत्य हैं की जिसने इस धरती पर जन्म लिया हैं, उसकी मृत्यु होनी निश्चित है। अर्थात जीवन का अंतिम और एकमात्र अटल सत्य मौत हैं। मौत से जुड़े हुए प्रशनों के उत्तर जान पाना किसी भी मनुष्य के लिए काफी मुश्किल भरा कार्य हैं।

वास्तव में मृत्यु क्या हैं और मृत्यु के बाद क्या होता हैं? इन सभी रहस्यों को वर्णन बालक नचिकेता और यमराज की कहानी में मिलता हैं। प्राचीन हिन्दू धर्मशास्त्र कठोपनिषद में आत्मा और मृत्यु से सम्बंधित रहस्यों का ज़िक्र किया गया हैं। जो मृत्यु के देवता यमराज और बालक नचिकेता के बीच हुए सवांद पर आधारित हैं। नचिकेता एक ब्राह्मण बालक था, जिसकी पितृभक्ति और आत्म ज्ञान की जिज्ञासा के आगे स्वयं मृत्यु के देवता धर्मराज यमराज को भी नतमस्तक होना पड़ा था। विलक्षण बुद्धि से समृद्ध बालक नचिकेता की कहानी और यमराज से जुड़ा हुआ यह प्रसंग न केवल पितृभक्ति को दर्शाता हैं, बल्कि इससे गुरु-शिष्य संबंधो को जानने में भी आसानी होती हैं।

यमराज और नचिकेता की कथा :-

प्रसंग के अनुसार नचिकेता के पिता ऋषि वाजश्रवस (उद्दालक) थे। एक बार उन्होंने विश्वजीत नामक यज्ञ किया। इस यज्ञ में सब कुछ दान किया जाता है। दान के समय नचिकेता यह देख कर हैरान हो गया की पिता स्वस्थ्य गायों की बजाये बीमार और कमजोर गायों का दान कर रहे हैं। सात्विक और तीक्ष्ण बुद्धि से युक्त बालक नचिकेता को यह समझ आ गया की उनके पिता, पुत्र मोह के चलते ऐसा कर रहे हैं।

पिता का मोह भंग करने और धर्म-कर्म के कार्य सही तरह से करवाने हेतु बालक नचिकेता ने अपने पिता से यह पूछा, आप दान में मुझे किसे देंगे? उद्दालक ऋषि ने इस प्रशन को टाल दिया, लेकिन बालक नचिकेता ने यह सवाल बार-बार अपने पिता से पुछा। अंत में ऋषि क्रोधित हो गये और क्रोध में आकर उन्होंने यह कह दिया की मैं तुझे मृत्यु (यमराज) को दान करूंगा। पिता ने जब यह वचन अपने मुख से निकाला तो उसके पश्चात उन्हें अपनी इस भूल पर दुःख भी हुआ। परन्तु सत्य की रक्षा के लिए बालक नचिकेता ने मृत्यु को दान करने का संकल्प पिता से पूरा करवाया।

उसके पश्चात बालक नचिकेता यमलोक गया। लेकिन यमलोक में पहुचने पर उसे यमलोक के द्वार पर ही रोक लिया गया। साथ ही नचिकेता को यह भी ज्ञात हुआ की यमराज वहां नहीं हैं। परन्तु नचिकेता ने हार नहीं मानी और वह तीन दिन तक यमलोक के द्वार पर यमराज की प्रतीक्षा में खड़ा रहा। जब यम यमलोक में आये तो उन्हें द्वारपालों से पितृभक्त और कठोर संकल्प से युक्त बालक नचिकेता के बारे में पता चला। बालक नचिकेता के कठोर संकल्प को देखते हुए यमराज उससे काफी ज्यादा प्रसन्न हुए। पिता की आज्ञा का पालन करने और 3 दिन तक कठोर प्रण करने के बदले यम ने बालक नचिकेता से 3 वर मांगने के लिए कहा।

तब नचिकेता ने पहला वर पिता का स्नेह माँगा। दुसरे वर में अग्नि विद्या का ज्ञान माँगा। तीसरा वर आत्मज्ञान और मृत्यु के रहस्य की जानकारी के बारे में था। धर्मराज यमराज ने नचिकेता को पहले 2 वर बिना किसी परेशानी के दे दिए, लेकिन अंतिम वर को उन्होंने टालने के भरपूर प्रयास किया। उन्होंने नचिकेता से यह कहा की वह मृत्यु से जुड़े हुए रहस्य को जानने की बजाये कोई अन्य वरदान मांग ले। उन्होंने बालक नचिकेता को तीसरे वरदान में सांसारिक सुख-सुविधाओं आदि को देने का लालच दिया। परन्तु बालक नचिकेता आत्मज्ञान को जानने के लिए पूरी तरह से दृढ़ रहा। नचिकेता ने यह कहा की यह सभी भोग-विलास की चीज़े नाशवान हैं, अतः आप मुझे शाश्वत आत्मज्ञान और मृत्यु के बारे में सभी रहस्य बताये। अंत में विवश होकर यमदेव ने मृत्यु के रहस्य, जन्म-मृत्यु से जुड़ा हुआ आत्मज्ञान, सभी प्रश्नों का उत्तर नचिकेता को दिया।

आत्मा का स्वरूप क्या हैं?

यमराज के अनुसार शरीर का नाश होने के बाद भी आत्मा का नाश नहीं होता हैं। आत्मा का भोग-विलास, अनित्य, जड़ और नाशवान शरीर से कुछ भी लेना-देना नहीं हैं। आत्मा अनंत, अनादी और दोष रहित होती हैं। इसका न कोई कारण है और न ही कोई कार्य, अर्थात न आत्मा का जन्म होता हैं और न ही यह मरती हैं।

ब्रह्म ज्ञान का दर्शन शरीर से किस तरह से होता हैं?

मनुष्य शरीर 11 द्वार वाला नगर हैं, यह 11 दरवाजे यह हैं 2 आँखें, 2 नाक की छिद्र, 2 कान, एक मूंह, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न। अजन्मा, ज्ञानस्वरूप, सर्वव्यापी, अजन्मा ब्रह्म की नगरी हैं। यह मनुष्य के ह्रदय में राजा की तरह रहते हैं। इस रहस्य को जान कर जो मनुष्य जीते जी भगवद ध्यान और चिंतन करता हैं। उसे कभी शोक नहीं होता हैं, बल्कि वह शोक होने लिए जिम्मेवार, इस संसार रुपी बन्धनों से मुक्त हो जाता है। शरीर त्यागने के बाद विदेह मुक्त यानी जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्त हो जाता हैं। उसकी यही अवस्था ही सर्वव्यापक ब्रह्म रूप है।

क्या आत्मा मरती या मारती हैं?

जो लोग आत्मा को मरने या मारने वाला मानते हैं, वे वास्तव में आत्म स्वरूप को जानते ही नहीं हैं। उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि आत्मा न ही मरती हैं और न ही यह किसी को मार सकती है।

क्या हैं आत्मा और परमात्मा से जुड़ी हुई अज्ञानता और अज्ञानियों का क्या होता हैं?

जिस प्रकार वर्षा का जल एक ही होता हैं, परन्तु ऊँचे पहाड़ों पर बरसने से वह एक जगह नहीं टिकता हैं। निचे की ओर बहकर कई प्रकार के रंग-रूप और गंध में परिवर्तित हो कर चारो ओर फैल जाता हैं। उसी प्रकार एक ही परमात्मा से जन्मे देव, असुर और मनुष्य हैं जो ईश्वर को अलग-अलग मान कर उसकी पूजा और उपासना करते हैं। उसे बारिश के पानी की तरह ही सुर-असुर के लोकों और कई प्रकार की योनियों में भटकना पड़ता हैं।

ब्रह्म का स्वरूप कैसा हैं और वह कहाँ और कैसे प्रगट होता हैं?

ब्रह्म प्रकृतिक गुण से परे, स्वयं दिव्य प्रकाश स्वरूप अन्तरिक्ष में प्रगट होने वाले वसु नामक देवता हैं। वे ही अतिथि के रूप में ग्रहस्थों के घरों में मौजूद रहते हैं, यज्ञ की वेदी में पवित्र अग्नि और उसमे आहुति देने वाले होते हैं। इसी प्रकार सारे मनुष्यों, श्रेष्ठ देवताओं, आकाश, पितरों और सत्य में वह स्तिथ होते हैं। पानी में मछली हो या शंख, धरती पर पेड़-पौधे, अनाज, औषधि, अंकुर तो पहाड़ों में नदी, झरनों और यज्ञ फल के रूप में भी ब्रह्म प्रगट होते हैं। इस प्रकार ब्रह्म प्रत्यक्ष, सत्य और श्रेष्ठ तत्व हैं।

शरीर से आत्मा निकल जाने के बाद शरीर में क्या शेष रह जाता हैं?

एक शरीर से दुसरे शरीर में आने-जाने वाली जीवात्मा जब वर्तमान शरीर से निकल जाती हैं। तो उसके साथ ही प्राण और इन्द्रिय ज्ञान भी शरीर क्या त्याग कर देते हैं। फिर इन सभी के शरीर से बाहर निकल जाने के बाद शरीर में क्या बाकी रह जाता है? यह नज़र तो कुछ नहीं आता, किन्तु वह परब्रह्म उसमे रह जाता हैं। प्रत्येक चेतन और जड़ और प्रकृति में सभी जगह, पूर्ण शक्ति और स्वरूप में वह हमेशा उपस्तिथ रहता हैं।

मृत्यु के पश्चात जीवात्मा को कौन सी योनियां मिलती हैं और क्यों मिलती हैं?

यमराज के अनुसार पुण्य और पाप कर्मों और शास्त्र, गुरु, संगती, शिक्षा और व्यापार के जरिये देखे-सूने गये भावों से पैदा हुए आंतरिक वासनाओं के अनुसार मरने के बाद जीवात्मा को दुसरा शरीर प्राप्त होता हैं। इसके लिए जीवात्मा नया शरीर धारण करने के लिए वीर्य के साथ माता के गर्भ में दाखिल होती हैं। जिस मनुष्य के पुण्य-पाप बराबर होते हैं, उन्हें अगले जन्म में मनुष्य योनी प्राप्त होती हैं। जिन मनुष्यों ने अपने जीवनकाल में पुण्य से ज्यादा पाप ज्यादा किये होते हैं, उन्हें पशु और पंछियों के योनी में जन्म लेना पड़ता हैं। जो बहुत ज्यादा पाप करते हैं, उन्हें पेड़-पौधे, लता, तिनका, पहाड़ जैसे जड़ योनियों में पैदा होना पड़ता हैं। जिन मनुष्यों ने सारी जिंदगी सिर्फ पाप ही किया होता हैं, उन्हें उनके कर्मों के अनुसार 28 प्रकार के नरकों में से किसी एक नर्क की प्राप्ति होती हैं



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