क्रिकेट से सीखे ज़िन्दगी कैसे जी जाती हैं.

क्रिकेट से सीखे जिंदगी को कैसे जीया जाता हैं

वास्तिवक जीवन में हमें कुछ ऐसे लोग देखने को मिलते हैं, जो हर परिस्थिति में सदैव फ्रंट फुट पर रहते हैं और पूरे आत्मविश्वास और उत्साह के साथ किसी भी बात का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं।

भारत देश में क्रिक्रेट का खेल को एक धर्म की तरह माना जाता है, जिसका प्रमाण किसी महत्वपूर्ण मैच के दौरान खाली रास्तों और हर घर में टीवी और रेडियो से चिपक कर बैठे हुए लोगों द्वारा हमें स्पष्टरूप से देखने को मिलता है। क्रिकेट के प्रति भारत वासियों में जो समर्पण और उन्माद दिखता है, वह किसी भक्ति या धर्मोन्माद से कम नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि भारत का हर दूसरा नागरिक बचपन से ही गिल्ली-डंडे के साथ साथ बल्ले और गेंद के इस अद्भुत खेल को खेलकर ही बडा हुआ है, इसीलिए ही तो भारत् को ‘क्रिकेट क्रेजी राष्ट्र’ कहा जाता हैं।

पर या हमने कभी क्रिकेट और हमारे वास्त्विक जीवन के बीच की समानता के बारे में गौर से सोचा है? शायद नहीं! क्योंकि हम में से अधिकांश लोगों के लिए जीवन क्रिकेट की तरह रोमांचक नहीं है।

ये तो हम सभी जानते ही हैं की हर एक दर्शक, फिर चाहे वह स्टेडियम में बैठकर मैच देख रहा हो या टीवी पर, उसे हर पल यही इंतजार रहता है की कब क्रीज पर खडा बल्लेबाज छक्का या चौका लगाएगा। हर बार जब छा या चौका लगता हैं, तब स्टेडियम में एकत्रित दर्शकगण एवं हर घर में टीवी के सामने बैठे दर्शक बडे उन्माद में आकर कूदकर और चिल्लाकर अपनी खुशी व्यक्त करने लगते हैं।

लेकिन, हम यह भी जानते हैं की छा या चौका लगाना यह हर बल्लेबाज के बस की बात नहीं हैं योंकि उस के लिए असाधारण कौशल के साथ ही एक केंद्रित मन की आवश्यकता है जो कुछ चुनिन्दा लोगों के पास ही होता है।

इसी प्रकार से कई बार हमने यह भी देखा है कि ऐन मौका पर जब एक भरोसेमंद खिलाडी मूर्खतापूर्ण शॉट खेलकर बाहर हो जाता है तब करोडों लोगों की धडकनें कुछ घडियों के लिए थम जाती हैं।

अब चलिए थोडा अपने वास्त्विक जीवन की ओर नजर डालते हैं, जहां पर हमें कई ऐसे लोग देखने को मिलते हैं, जो हमेशा घबराए हुए रहते हैं और हर परिस्थिति में बैकफुट पर यानि की बचाव की मुद्रा में रहते हैं।

जिस वजह से न वह आगे बढ पाते हैं और न पीछे आ पाते हैं, मानो जैसे उनकी हालत त्रिशंकु जैसी हो जाती है। वहीं दूसरी ओर हमें ऐसे भी लोग देखने को मिलते हैं जो हर परिस्थिति में सदैव फ्रंट फुट पर रहते हैं और पूरे आत्मविश्वास और उत्साह के साथ किसी भी बात् का सामना करने के लिए तैयार होते हैं।

उपरोक्त दो प्रकार के लोगों में से सदा भयभीत और पीछे-पीछे रहने वाले लोग अत्यंत दयनीय जीवन जीते रहते हैं योंकि अगले क्षण की निरंतर चिंता उनके आत्मविश्वास के स्तर को बिलकुल निम्न कर देती है।

परिणामस्वरूप उन्हें बडी मुश्किल और संघर्ष के बाद छोटे अंतराल में सुख प्राप्त होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी बल्लेबाज को दौडकर एक-एक रन मिलता है।

संक्षेप में ऐसे लोग हर समय रक्षात्मक खेल ही खेलते हैं और उनके शॉट्स कभी भी छक्के या चौके में रूपांतरित नहीं हो पाते हैं क्यों कि वे रन बनाने के हर अवसर को गेंदबाज की उन्हें आउट करने की साजिश समझते हैं जिस वजह से जीवनभर वे सिंगल्स और डबल्स तक ही सीमित रह जाते हैं। वहीं दूसरी ओर जो साहसी और हर बात में आगे रहने वाले होते हैं।

जीवन एक खेल है, जिसे उत्साह से खेलें

जब आत्मविश्वास और अधिक से अधिक शक्ति के साथ अपने शॉट्स खेलते हैं, तब निश्चित रूप से वे गेंद को बाउंड्री के उस पार भेजने में सफल हो जाते हैं। परन्तु यह तब संभव होगा जब हमारे अंदर यह आत्मविश्वास बने कि जीवन वह खेल है जिसे सतत उत्साह के साथ खेलना चाहिए ताकि सभी प्रकार की बाधाओं को आसानी के साथ पार किया जा सके। –

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