जानिए माँ गंगा ने अपने ही पुत्रों को नदी में क्यों बहाया?

देवी गंगा ने अपने ही पुत्रों को नदी में क्यों बहाया?

भारतीय समाज में गंगा नदी देश की सबसे पवित्र नदी हैं। गंगा जी से सम्बंधित कई सारी कथाएँ आपको पुराणों में मिल जाएँगी। भीष्म पितामह को गंगा पुत्र कहा जाता हैं। भीष्म पितामह देवी गंगा और राजा शांतनु के पुत्र थे। लेकिन एक बात जो बहुत ही कम लोग ही जानते हैं, उसके बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं।

महाभिष को ब्रह्मा जी ने दिया था श्राप

प्राचीन काल में इक्ष्वाकु वंश के एक प्रतापी रजा महाभिष थे। उन्होंने महान यज्ञ करवाए स्वर्ग लोग की प्राप्ति की। एक दिन कई सारे देवता और राजर्षि जिनमे महाभिष भी शामिल थे, ब्रह्मा जी की सेवा करने के लिए लगे। वहा देवी गंगा भी मौजूद थी। तभी वायु के चलने के कारण देवी गंगा के शरीर से वस्त्र थोड़े से खिसक गये। वहां पर उपस्तिथ सभी देवताओं ने अपने आँखें नीची कर ली, लेकिन राजा महाभिष देवी गंगा को देखते ही रह गये। जब ब्रह्मा जी ने यह सब देखा तो उन्होंने महाभिष को मृत्युलोक में जन्म लेने का श्राप दे दिया और कहा की जब तुम पृथ्वीलोक पर गंगा के ऊपर क्रोध करोगो तब तुम श्राप से मुक्त हो जाओगे।

राजा शांतनु की पत्नी बनी देवी गंगा

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के श्राप की वजह से राजा महाभिष ने पुरुवंश में राजा प्रतिप के घर जन्म लिया। इस जन्म में उनका नाम राजा शांतनु था। एक दिन राजा शांतनु शिकार खेलते समय गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे, तभी उन्होंने एक सुंदर स्त्री को वहां देखा। राजा शांतनु ने सुंदर स्त्री (जो की देवी गंगा थी) को देख कर उसपर मोहित हो गये। उन्होंने सुंदर स्त्री से विवाह करने का प्रस्ताव रखा। जिस पर देवी गंगा ने यह कहा की उन्हें उनका प्रस्ताव स्वीकार हैं, लेकिन एक शर्त हैं की राजा शांतनु उन्हें किसी बात के लिए रोकेंगे नहीं, अगर उन्होंने कभी भी कोई प्रश्न पूछा तो वह उन्हें छोड़ कर चली जाएगी। राजा शांतनु ने उनकी शर्त को मान लिया और दोनों ने विवाह कर लिया।

देवी गंगा ने राजा शांतनु के पुत्रों को नदी में इसलिए बहाया

विवाह के पश्चात् राजा शांतनु और देवी गंगा के एक एक करके 7 पुत्र हुए। जब भी देवी गंगा ने पुत्र को जन्म दिया तो वह नवजात शिशु को ले जा कर गंगा नदी में प्रवाहित कर आती थी। राजा शांतनु यह देख कर काफी दुखी हो जाते थे, लेकिन वह अपनी पत्नी से इसका कारण नहीं पूछना चाहते थे की आखिर वह अपने ही पुत्रों को नदी में डाल कर क्यों बहा रही हैं? उन्हें डर था की अगर उन्होंने देवी गंगा से इस बारे में कोई प्रश्न पूछा तो शर्त के मुताबिक वह उन्हें तुरंत छोड़ कर चली जाएँगी।

लेकिन जब उनके घर आठवां पुत्र पैदा हुआ तो उनकी पत्नी उसे भी नदी में बहाने के लिए ले जाने लगी। इस बार राजा शांतनु अपने आप को संभाल नहीं पाए और उन्होंने देवी गंगा से पुत्र को नदी में डालने से रोका और उनसे पूछा आखिर वह ऐसा क्यों कर रही हैं?

तब उनकी पत्नी ने उन्हें बताया की वह देव नदी गंगा हैं। जिन पुत्रो को उन्होंने नदी में बहाया हैं, वे सभी वसु थे, जो की वशिष्ठ ऋषि के श्राप के कारण मृत्युलोक में जन्मे थे। उनकी मुक्ति के लिए ही मैंने आपके पुत्रों को नदी में प्रवाहित कर दिया। लेकिन अपने अपनी शर्त तोड़ दी हैं और मुझे अपना कार्य करने से रोका हैं, इसलिए मैं आपको छोड़ कर जा रही हूँ। ऐसा कह कर देवी गंगा अपने आठवे पुत्र को अपने साथ ले कर चली गयी।

वसुओं का देवी गंगा के गर्भ से जन्म लेने का कारण?

एक बार पृथु आदि वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे। उसी पर्वत पर महर्षि वशिष्ट मुनि का आश्रम था। उस आश्रम में नंदिनी नाम की एक दिव्य गाय थी। उन्ही वसुओं में से एक द्यो नामक वसु ने अन्य वसुओं के साथ मिल कर अपनी पत्नी के लिए उस गाय का हरण कर लिया। जब यह बात महर्षि वशिष्ठ को पता चली तो उन्होंने सभी वसुओं को मृत्यलोक में मनुष्य योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया।

वसुनों से फिर महर्षि से अपने द्वारा की गयी गलती के लिए क्षमा प्राथना की। इस पर महर्षि वशिष्ट ने उन्हें कहा की तुम लोग जन्म लेते ही ही शीघ्र ही मनुष्य योनी से मुक्त हो जाओगे, लेकिन द्यौ नामक वसु को ज्यादा समय तक मनुष्य रूप में पृथ्वी लोक पर अपने कर्मो का फल भोगना पड़ेगा।

इस श्राप की बात जब सभी वसुओं ने देवी गंगा से की तो, उन्होंने वसुओं को कहा की वह उन्हें मनुष्य रूप में अपने गर्भ से जन्म देगी और तुरंत ही उन्हें मनुष्य योनी से मुक्त कर देंगी। देवी गंगा ने ऐसा ही किया और वे सभी श्रापित वसुओं देवी गंगा और राजा शांतनु के पुत्र के रूप में जन्म लिया। लेकिन जैसा की एक वसु जिसका नाम द्यो था, उसे श्राप के कारण ज्यादा समय तक मृत्युलोक में रहना था, उस वसु ने भीष्म पितामह के रूप में जन्म दिया, जिन्हें धरती पर रह कर कई सारे दुःख भोगने थे।

देवव्रत को मिली श्रेष्ठ शिक्षा और भीष्म प्रतिज्ञा

देवी गंगा जब शांतनु के आठवे पुत्र को अपने साथ ले कर चली गयी तो राजा शांतनु काफी ज्यादा उदास रहने लगे। इस प्रकार समय बीतता गया। एक दिन राजा शांतनु गंगा नदी के तट पर भ्रमण कर रहे थे, की तभी उन्होंने देखा की गंगा में बहुत थोड़ा पानी रह गया हैं और वह बह भी नहीं रहा हैं। इस रहस्य का पता लगाने के लिए वह आगे बढ़े तभी एक सुंदर बालक अस्त्र-शस्त्र का अभ्यास कर रहा था। उस दिव्य बालक ने अपने बाणों से नदी के जल को बहने से रोक दिया था।

यह देख कर राजा शांतनु हैरान हो गये और तभी शांतनु की पत्नी देवी गंगा वह प्रगट हुई। उन्होंने महाराज शांतनु को यह बताया की यह उनका आठवां पुत्र हैं, इसका नाम देवव्रत हैं। इसने महर्षि वशिष्ठ से वेदों का ज्ञान अर्जित किया हैं और पशुराम जी से सभी प्रकार के अस्त्र शस्त्र चलाने की विद्या सीखी हैं। यह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं और इंद्र के समान तेज़श्वी हैं। इसके बाद देवी गंगा देवव्रत को उनके पिता राजा शांतनु को शौंप कर चली गयी।

एक दिन राजा शांतुन गंगा नदी के तट पर भ्रमण कर रहे थे, तभी उन्हें उस नदी के तट पर एक सुंदर कन्या दिखाई दी। वह एक मल्लाह की कन्या थी, जिसका नाम सत्यवती था। राजा शांतनु उस कन्या को देख कर मोहित हो गये। वह निषादराज के पास उसकी पुत्री से विवाह करने का प्रस्ताव ले कर गये, जिस पर निषादराज ने यह कहा की सत्यवती के गर्भ से जन्मा पुत्र ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा, तभी इस शर्त पर वह अपनी कन्या सत्यवती का विवाह उनसे करेंगे। राजा शांतनु को यह शर्त पसंद नहीं आई, फिर वह वहां से बिना कुछ कहे चले आये। वह सत्यवती के प्रेम में व्याकुल हो गये, अब उन्हें कुछ भी खाना पीना अच्छा नहीं लगता था। जब देवव्रत ने अपने पिता की यह हालत देखी तो वह निषादराज के पास अपने पिता शांतनु का विवाह सत्यवती से करवाने के लिए प्रस्ताव ले गये।

जिस पर सत्यवती के पिता ने कहा की वह अपनी पुत्री का विवाह राजा शांतनु से एक शर्त पर करेंगे की शांतनु और सत्यवती की संतान ही राज्य की उत्तराधिकारी बनेगी। इस पर राजकुमार देवव्रत ने कहा ठीक हैं, मैं आगे चलकर राजा नहीं बनूँगा। इस पर सत्यवती के पिता ने राजकुमार देवव्रत से कहा, मुझे पता हैं की आप अपने प्रण पर कायम रहेंगे, लेकिन आगे चलकर आपके पुत्र हुए तो वह इस राज्य के उतराधिकारी बनेंगे। इस पर देवव्रत ने प्रण लिया की वह आजीवन विवाह ही नहीं करेंगे और उनकी कोई संतान नहीं होगी। इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत का नाम भीष्म पड़ गया। फिर देवव्रत ने अपने पिता का विवाह सत्यवती से करवा दिया।

जब पिता शांतनु को देवव्रत की इस प्रतिज्ञा के बारे में पता चला और उन्होंने यह देखा की वह अपने पिता की ख़ुशी के लिए ऐसा कठोर प्रण ले रहे हैं, तो वह देवव्रत के पास गये। राजा शांतनु ने अपने पुत्र देवव्रत को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। यही कारण हैं की भीष्म पितामह को अर्जुन ने बाणों की शयां पर लेटा दिया था, लेकिन उस समय सूर्य देव दक्षिणायन में चल रहे थे। और ऐसी मान्यता थी की जिस मनुष्य की मृत्यु दक्षिणायन में होती हैं, उसे नर्क जाना पड़ता हैं। इसी इच्छा मृत्यु के वरदान की वजह से भीष्म पितामह सूर्य देव को उत्तरायण में जाने की प्रतीक्षा करते रहे और तमाम तरह की पीड़ा सहते रहे।




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