भीष्म पितामह ने पिछले जन्म में की थी गाय चोरी, इसलिए उन्हें भुगतनी पड़ी यातनाये।

bhishma Pitamah why face many difficulties in his life.

भीष्म पितामह जब बाणों की शय्या पर लेटे थे तो उन्हें काफी ज्यादा पीड़ा हो रही थी। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए अर्जुन ने जब भीष्म पितामह को अपने बाणों से छलनी कर दिया तो भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे। क्योंकि उस समय सूर्य देव दक्षिणायन में चल रहे थे। ऐसी धार्मिक मान्यता हैं की जिस मनुष्य की मृत्यु दक्षिणायन में होती हैं, उसे मरने के बाद नर्क की प्राप्ति होती हैं। जबकि भीष्म पितामह को उनके पिता शांतनु ने इच्छा मृत्यु का वरदान दिया था। जिसके कारण इतना ज्यादा घायल होने के बावजूद भीष्म पितामह सूर्य देव के उत्तरायण में जाने की प्रतीक्षा करने लगे और बाणों की शय्या पर लेटे हुए मृत्यु तक पीड़ा सहते रहे।

मृत्यु से पहले भीष्म पितामह ने जब सिरहाने की मांग की तो अर्जुन ने बाणों से सिरहाना बना दिया। मूंह में उनके तुलसी का पत्ता रखा और जब भीष्म पितामह को प्यास लगी तो अर्जुन ने अपने बाणों से धरती से गंगा प्रगट कर दिया, गंगा की धार सीधे बाणों की शय्या पर सोये हुए भीष्म पितामह के मूंह में पड़ी और उनकी प्यास शांत हुई। जब भीष्म पितामह के प्राण निकलने वाले थे तो युधिष्ठिर को उन्होंने अपने समक्ष बुलाया और उन्हें विष्णुसहश्त्र नाम (जिसकी रचना स्वयं भीष्म पितामह ने की थी) शौंप दिया और भगवान श्री कृष्ण का नाम लेते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

महाभारत में एक से बढ़ कर एक चरित्र आपको देखने के लिय मिल जायेंगे। लेकिन अक्सर हमारे मन में प्रश्न आता हैं की आखिर भीष्म पितामह एक धर्म परायण ज्ञानी व्यक्ति थे, लेकिन उनकी ऐसी दुर्गति क्यों हुई? आखिर क्या कारण हैं की भीष्म पितामह को जीवन में इतने सारे कष्ट भोगने पड़े? इस सभी प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें भीष्म पितामह के पूर्व जन्म के बारे में जानना पड़ेगा। क्योंकि पिछले जन्म में किये गये पाप की वजह से उन्हें इस जन्म में काफी ज्यादा पीड़ा और कष्ट भोगना पड़ा था।

आपको शास्त्रों में 8 वसुओं का वर्णन मिल जायेगा। एक दिन 8 वसु वशिष्ट ऋषि के आश्रम में गये। भीष्म पितामह जी उन्ही आठ वसुओं में से एक थे। उनका नाम द्यो वसु था। जब सभी वसु वशिष्ठ मुनि के आश्रम गये तो वहां पर उन्होंने कामधेनु गाय को देखा। द्यो वसु को कामधेनु गाय को प्राप्त करने का लालच आ गया।

उनमे से द्यो वसु ने गाय को चोरी करने का निर्णय लिया और बाकी के 7 वसुओं ने गाय की चोरी में उसकी मदद की। लेकिन वशिष्ठ ऋषि को जब इसके बारे में पता चला तो उन्होंने सभी वसुओं को पृथ्वी लोक पर मनुष्य के रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। आखिर सभी वसुओं ने अपने द्वारा किये गये अपराध के लिए क्षमा मांगी। इस पर ऋषिवर ने बाकी के 7 वसुओं को जन्म लेते ही श्राप से मुक्ति मिलने का वरदान दे दिया, लेकिन द्यो वसु को लम्बी आयु तक मनुष्य जन्म लेकर धरती पर निवास करने का श्राप बरकरार रखा। इन अष्ट वसुओं में लम्बी उम्र तक मनुष्य रूप में जीने वाले यानी गाय की चोरी करने वाले वसु ही भीष्म पितामह थे। जिन्होंने माँ गंगा के पुत्र के रूप में जन्म लिया। भीष्म पितामह को गंगा पुत्र भी कहा जाता हैं।

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भीष्म पितामह ने युद्ध और शस्त्रों की कला परशुराम जी से प्राप्त की। यानी परशुराम जी भीष्म पितामह के गुरु थे। देवराज इंद्र ने भीष्म पितामह को दिव्य अस्त्र प्रदान किये। मार्कण्डेय जी ने उन्हें चीर यौवन तो बाकि सभी ने राजनीति और राजपथ की शिक्षा प्रदान की। महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह प्रतिदिन 10,000 सैनिकों और 1,000 घुड़सवारों को अपने बाणों से मारते थे। लेकिन उन्हें पांडवों से बहुत ही ज्यादा स्नेह था, इसलिए वह पांडवों का वध नहीं कर पा रहे थे।

यह देख कर दुर्योधन भीष्म पितामह पर क्रोधित हो गया और उन्हें बुरा-भला कहा। इस पर भीष्म पितामह ने प्रण लिया की कल वह अर्जुन को अपना निशाना बनायेंगे या फिर भगवान श्री कृष्ण ने शस्त्र न उठाने का जो प्रण लिया हैं, उनकी प्रतिज्ञा को तुड़वा देंगे। अगले दिन भीष्म पितामह और अर्जुन में युद्ध होने लगा। लेकिन अर्जुन मोह-माया में आकर भीष्म पितामह से मन से युद्ध नहीं कर पा रहे थे। यह देख कर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को मोह-माया को त्याग कर युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन अर्जुन फिर भी उसी कशमश में फंसे हुए थे। अंत में श्री कृष्ण भगवान ने रथ का पहिया उखाड़ लिया और वह भीष्म पितामह को मारने के लिए आगे बढ़े। यह देख कर अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण के पाँव पकड़ लिए और उनसे क्षमा मांगी। यह सब देख कर भीष्म पितामह मुस्कुराने लगे और उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को मन ही मन धन्यवाद किया। क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने भीष्म की प्रतिज्ञा का सम्मान रखा और अपने शस्त्र न उठाने वाली प्रतिज्ञा को तोड़ दिया।

अब रात हो चुकी थी, भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को भीष्म पितामह के शिविर में भेजा और उनसे उन्हें युद्ध में हराने के लिए उपाय पुछा। इस पर भीष्म पितामह ने शिखंडी को समाधान बताया। अंत में युद्ध में शिखंडी को आगे कर के अर्जुन ने भीष्म पितामह के शरीर में बाणों की वर्षा कर दी। इसके बाद भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेट गये। सच में भीष्म पितामह महान धनुर्धर थे, वह जब तक युद्ध में रहते, तब तक पांडव कौरवों को पराजित नहीं कर सकते थे। लेकिन वह तन से चाहे दुर्योधन की ओर से लड़ रहे थे, परन्तु मन तो उनका हमेशा पांडवों की तरफ ही था। अंत में उन्होंने इच्छा मृत्यु वरदान का लाभ उठाया और ऐसी घड़ी में अपने प्राण त्यागे, जिससे वह ब्रह्म लोक में चले गये।



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