जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया) की कथा और इसे कैसे मनाया जाता हैं।

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा. हिन्दू व्रत कथा और महत्व.

भारत एक ऐसा देश हैं जहाँ पर विभिन्न प्रकार की संस्कृतियां हैं और यहाँ पर अनेकों त्यौहार मनाये जाते हैं। सभी व्रत और त्योहारों से सम्बंधित कुछ कहानियां और मान्यताये भी हैं। इन्ही त्योहारों में से हैं एक हैं जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जीवित पुत्र के लिए रखे जाना व्रत। जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया या जिउतिया के नाम से भी जाना जाता हैं। यह व्रत माएं अपने पुत्रों की लम्बी आयु के लिए रखती हैं। जितिया यानि जिउतिया व्रत खास करके पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और नेपाल आदि जगहों पर किया जाता हैं। आइये जानते हैं जिउतिया से जुड़ी हुई कहानी और इसे कैसे मनाया जाता हैं।

कब पड़ता हैं जिउतिया (जीवित्पुत्रिका व्रत) ?

जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया (जिउतिया) का व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी (श्राद्ध पक्ष की अष्टमी) के दिन रखा जाता हैं। यह व्रत वह स्त्रियाँ रखती हैं, जिनके पुत्र जीवित हैं। इस व्रत को रख कर माएं अपने पुत्र की लम्बी आयु की कामना करती हैं। यह पुरे 24 घंटे तक रखे जाने वाला व्रत हैं। खास बात हैं की इस व्रत में माओं को पुरे 24 घंटे तक निर्जला व्रत (बिना पानी पिए) रहना पड़ता हैं। जिउतिया व्रत करने का महत्व बहुत बड़ा हैं। सच में इस व्रत को करना माँ का अपने पुत्र के प्रति स्नेह को दर्शाता हैं।

जीवित्पुत्रिका व्रत की कहानी :-

जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा जीमूतवाहन के साथ जुड़ी हुई है। गन्धर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन थे। जीमूतवाहन बहुत ही ज्यादा परोपकारी और दयालु थे। जीमूतवाहन के पिता वृद्धावस्था के चलते वानप्रस्थ आश्रम में चले गये और जीमूतवाहन को गन्धर्वों का राजा बना दिया। लेकिन जीमूतवाहन का मन राजकाज के कार्यो में नहीं लगता था। इसलिए जीमूतवाहन ने अपनी राजगद्दी अपने भाइयों को सौप दी और वह अपने पिता के पास जंगल में चले गये। जंगल में उनका विवाह मलयवती नामक राजकन्या से हुआ।

एक दिन जगल में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी ज्यादा दूर चले गये। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध स्त्री रोते हुए दिखाई दी। जीमूतवाहन ने बूढ़ी औरत से उसके रोने का कारण पुछा तो उस वृद्ध महिला ने यह बताया की वह एक नाग कन्या हैं और उसका एक पुत्र भी हैं। पक्षीराज गरुण के समक्ष यह समझौता हुआ है की प्रत्येक दिन एक नाग उनका आहार बनेगा। यानी की रोजाना एक नाग का भक्षण गरुण करेंगे। आज मेरे पुत्र शंखचूड़ की बारी हैं, जिसे आज गरुण खा जायेंगे।

जीमूतवाहन ने वृद्ध महिला को भरोसा दिलाये हुए कहा,” घबराईये मत, मैं आपके पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा। आज शंखचूड़ की जगह पर मैं स्वयं को लाल कपड़े में ढक कर वध्य-शिला पर लेटूंगा।“ यह कह कर जीमूतवाहन ने शंखचूड़ के हाथ से लाल कपड़ा ले लिया और वह कपड़े को लपेट कर गरुण को बलि देने के लिए चुनी गयी जगह वध्य-शिला पर लेट गये।

फिर गरुण आये और उन्होंने लाल कपड़े में ढके हुए जीमूतवाहन को अपने पंजे में दबोचा और पर्वत के शिखिर पर उड़ा कर ले गये। अपने चंगुल में आये प्राणी के आँख से आंसू और मूंह से आह न निकलते हुए देख गरुण काफी ज्यादा आश्चर्यचकित हुए।

उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पुछा। तब जीमूतवाहन ने सारा वृतांत गरुण जी को सुनाया। गरुण जी जीमूतवाहन की बहादुरी और दूसरों की प्राण-रक्षा करने के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत ज्यादा प्रसन्न हुए। गरुण जी ने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया तथा भविष्य में नागों की बलि न लेने का भी वरदान दिया। इस तरह जीमूतवाहन के साहस के कारण नाग-जाती की रक्षा हुई और तबसे पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की जाने लगी। इसी के उपलक्ष में जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता हैं।

चिल्हों (चिल) सियारिन की कथा :-

एक बार की बात हैं एक चिल और एक सियारिन थी, और वे दोनों अच्छी मित्र भी थी। चिल और सियारिन के भी कई सारे पुत्र थे। एक दिन दोनों ने कुछ महिलाओं को जिउतिया व्रत करते हुए देखा। दोनों के मन में यह विचार आया क्यों न यह जितिया उपवास किया जाये। उसके बाद चिल और सियारिन ने जिउतिया का व्रत रखा। लेकिन जब शाम हुई तो सियारिन को बहुत ज्यादा भूख लगने लगी, और भूख से व्याकुल होकर उसने खाना खा लिया। जबकि चिल ने व्रत का पालन बहुत ही श्रद्धा के साथ किया। चिल को जब इस बात का पता चला की सियारिन ने जितिया का उपवास अधूरा ही तोड़ दिया हैं तो उसने सियारिन को कहा, “अगर तुम्हे व्रत पूरा नहीं करना था, तो तुमने व्रत रखा ही क्यों?” इस पर सियारिन ने उत्तर दिया की भूख मुझे बर्दास्त नहीं हो रही थी। समय बीतने के साथ चिल के पुत्र ज्यादा दिन तक जीवित रहे। जबकि सियारिन के पुत्र एक-एक करके मरने लगे। इसलिए माएं जिउतिया व्रत के दौरान यह प्राथना करती हैं की उनके पुत्र भी चिल्हों के पुत्र की भाँती लम्बी उम्र तक जीवित रहे और उनका व्रत भी चिल्हो की तरह पूरा हो जाये।

कैसे रखा जाता हैं जिउतिया का व्रत :-

वैसे तो अलग-अलग जगहों पर जितिया का उपवास रखने की अलग-अलग विधि हैं। लेकिन जो जानकारी हमें मिली हैं उसके अनुसार सबसे पहले माएं आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के पहले यानी सप्तमी के दिन (रात के 2-3 बजे) उठकर दही-च्यूरा खाती हैं और तरोई की सब्जी और रोटी भी बना कर खाती हैं। इसके अलावा वह तरोई की सब्जी, रोटी और दही-चूड़ा चिल्हो-सियारिन के लिए भी रख देती हैं। ताकि चिल्हों-सियारिन भी व्रत रख सके।

फिर उसके बाद सुबह होते ही (आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन) वह किसी पवित्र नदी आदि में स्नान करती हैं। फिर 24 घंटे तक बिना पानी पिए और कुछ भी खाए बिना जिउतिया का व्रत रखती हैं। यानी की जिउतिया का व्रत निर्जला व्रत होता हैं। फिर अगले दिन (नवमी के दिन) व्रत करने वाली माएं अपने व्रत का पारण करती हैं।

इसके लिए वह लाल या पीले रंग का धागा (इस धागे को जिउतिया कहा जाता हैं) को चढ़ा कर गले में पहनती हैं। खास बात यह हैं की इस लाल अथवा पीले रंग के धागे में वह उतनी संख्या में गाँठ मारती हैं, जितनी संख्या में उनके पुत्र होते हैं। फिर गाय के दूध में भूरी शक्कर (खांड), तुलसी के पत्ते, हरी उड़द (हरे रंग की उड़द जो लखनऊ के निकटवर्ती जगहों पर पायी जाती हैं) मिला कर प्रसाद बनाया जाता हैं। जिसके बाद व्रत रखने वाली महिला इस प्रसाद को उतनी बार ग्रहण करती हैं, जितने उसके पुत्र होते हैं। प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती महिला का व्रत पूरा हो जाता हैं। इसके बाद प्रसाद को व्रती-महिला अपने पुत्रों को खिलाती हैं। यह प्रसाद सिर्फ महिला और उसके पुत्र ही खा सकते हैं।




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