डायबिटीज के बारे में पूरी जानकारी।

Diabetes kya hain? What is Diabetes in Hindi? Diabetes ke baare mein puri jankari. General Knowledge & full Information About Diabetes in Hindi.

डायबिटीज बहुत ही तेज़ी के साथ फैल रही हैं। आज के इस लेख में हम आपको डायबिटीज क्या हैं? यह कितनी तरह की होती हैं? इसका पता लगाने के लिए कौन-कौन सा टेस्ट करवाना चाहिए? इंसुलिन क्यों ले, इन सभी के बारे चर्चा करेंगे। तो आइये जानते हैं मधुमेह की बीमारी के बारे में। GK & Full Information about Diabetes in Hindi.

आज हम आपको डायबिटीज के बारे में पूरी जानकारी देने की कोशिश करेंगे। मोटे तौर पर समझने की कोशिश करे तो डायबिटीज जिसे मधुमेह या शुगर भी कहा जाता हैं अनबैलेंस्ड हॉर्मोन्स, मोटापा और अनहेल्दी लाइफस्टाइल का एक मिला-जुला परिणाम हैं। इन कारणों से भोजन से मिला कारबोहाइड्रेट, जिसे हमारी कोशिकाओं में एनर्जी देने का काम करना चाहिए, वह खून में ही घूमता रहता हैं। इससे खून में शुगर की मात्रा तो ज़रूरत से ज़्यादा मिलती ही हैं, शरीर की सभी अंगो की नसो पर इसका असर पड़ने लगता हैं।

डायबिटीज कितनी तरह की होती हैं ?

डायबिटीज के टाइप

1)  टाइप 1 डायबिटीज :- यह बचपन या किशोर अवस्था में अचानक इंसुलिन के उत्पादन में कमी होने से पैदा होने वाली बीमारी हैं। इसमे इंसुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह से बंद हो जाता हैं। ऐसा किसी एंटीबाडी की वजह से बीटा सेल्स के पूरी तरह से काम बंद करने के कारण होता हैं। ऐसे में शरीर में ग्लूकोज की बढ़ी हुई मात्रा को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन की ज़रूरत होती हैं। इसके मरीज़ काफ़ी कम होते हैं।

2) टाइप 2 डायबिटीज :- आम-तौर पर 30 साल की उम्र के बाद धीरे-धीरे यह बढ़ता हैं। इससे प्रभावित ज़्यादातर लोगो का वजन नार्मल से ज़्यादा होता हैं या उन्हे पेट में मोटापे की समस्या होती हैं। यह कई बार अनुवांशिक होता हैं या फिर खराब लाइफस्टाइल के कारण होता हैं। इसमे इंसुलिन कम मात्रा में बनता हैं या फिर Pancreas सही से काम नही कर रहा होता हैं। डायबिटीज की 90% मरीज़ इस केटेगरी में आते हैं। कसरत, संतुलित आहार और दवाइयों से इसे कण्ट्रोल में रखा जा सकता हैं।

कौन-कौन से टेस्ट करवाए :-

ब्लड टेस्ट

अगर ब्लड शुगर 170 से ज़्यादा नही हैं तो पेशाब में नही आएगी, इसलिए ब्लड टेस्ट ज़रूरी हैं। ब्लड टेस्ट 2 बार किया जाता हैं- खाली पेट और नाश्ता या ग्लूकोज़ लेने के बाद।

ध्यान रखे:-

1. इस टेस्ट से 3-4 दिन पहले से कारबोहाइड्रेट से भरपूर खाना खाना चाहिए।

2. टेस्ट से पहले कोलेस्टरॉल कम करने वाली नियासिन टेबलेट्स, विटामिन सी, एस्परिन, गर्भ-निरोधक दवाइया आदि का इस्तेमाल बिल्कुल ना करे। इनसे पेशाब में शुगर लेवल कम आ सकता हैं, जिससे सही रीडिंग नही आ पाएगी।

3. जिस व्यक्ति को 75 ग्राम ग्लूकोज़ खा कर 2 घंटे बाद टेस्ट देना हैं, उसे कंही नही जाना चाहिए। बल्कि वही ठहरना चाहिए। एक डेढ़ घंटे तक घूम आए, ऐसा नही करना चाहिए। इससे टेस्ट के रिज़ल्ट पर असर पड़ता हैं।

डायबिटीज के मरीज़ हैं तो इन टेस्ट को करवाते रहे

– खाली पेट ब्लड शुगर (नॉर्मल रेंज 100-120) और खाना खाने के 2 घंटे बाद (नॉर्मल रेंज 130-160) हफ्ते में कम से कम एक बार।

– HbA1c टेस्ट हर टीन से चार महीने बाद करवाए।

इस टेस्ट में आपको खाली पेट या खाना खाने के 2 घंटे बाद का ब्लड सैंपल देने की ज़रूरत नही हैं। कभी भी किसी भी लैब में जाकर HbA1c (ग्लाइकेटेड हेमॉग्लोबिन) टेस्ट करने के लिए सैंपल दे सकते हैं।

यह टेस्ट सिर्फ़ डायबिटीज के मरीज़ ही नही बल्कि नॉर्मल और प्री-डायबिटिक लोग भी करवा सकते हैं। HbA1c से सही समय पर डायबिटीज की सही प्रोसेस का पता लगाया जा सकता हैं। इससे ऐसे बिना डायबिटीज वाले मरीज़ो का कंफ्यूजन भी ख़त्म हो जाता हैं, जिनका एमर्जेन्सी में किए गये टेस्ट में ब्लड ग्लूकोज़ लेवल ज़्यादा आया हो।

इस टेस्ट से लास्ट तीन महीनो की एवरेज स्तिथि का पता लग जाता हैं। हेमॉग्लोबिन ब्लड के रेड सेल्स से बनता हैं और इसमे ग्लूकोज़ मिलता हैं तो ग्लाइकॉसिलेटेड हेमॉग्लोबिन बनता हैं। HbA1c टेस्ट पिछले तीन महीनो का एवरेज ब्लड शुगर लेवल बता देता हैं। इसकी नॉर्मल रेंज 4 से 6 पर्सेंट तक मानी जाती हैं, लेकिन 5।7 से 6।4 पर्सेंट होने का मतलब आपकी सेहत के लिए ख़तरे की घंटी बज चुकी हैं। यह प्री डायबिटीज की स्टेज होती हैं, जो आगे चल कर डायबिटीज में बदल सकती हैं। डायबिटीज के मरीज़ो में HbA1c 6।5 से 7 पर्सेंट तक रहे तो डायबिटीज कंट्रोल में मानी जाती हैं।

और कौन सी जाँच करवाए :-

– खून में कोलेस्टरॉल और फैट की मात्रा के लिए Lipid Profile test।

– ECG और TMT टेस्ट आँखो की जाँच के लिए।

– वजन का रिकॉर्ड

– पैरो की जाँच, ब्लड प्रेशर की जाँच।

– किड्नी का टेस्ट।

यह सभी जाँच 1 साल में एक बार करा ले।

सभी अंगो पर डायबिटीज का असर :- किड्नी पर कुछ साल बाद इसका असर शुरू हो जाता हैं। इसे रोकने के लिए ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनो को नॉर्मल रखना चाहिए। ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखकर आँखो की मोतियाबिंद जैसी बीमारियो से बचाया जा सकता हैं। डायबिटीज के मरीज़ो में अक्सर 65 साल की उमर तक पहुचते-पहुचते दिल के दौरे की समस्या शुरू हो जाती हैं। इससे बचने के लिए ग्लूकोज़ लेवल को कंट्रोल में रखने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर, कोलेस्टरॉल और टेंशन आदि पर भी कंट्रोल करना चाहिए।

दूसरी बीमारिया :-

– हार्ट अटैक, स्ट्रोक, लकवा, इन्फेक्शन और किडनी फेलियर।

– स्किन और आँखो की समस्या।

– पैरो की समस्याएँ।

– दांतो की बीमारिया।

– पुरुषो में नपुंसकता और महिलाओं में बांझपन।

– फ्रोज़न शोल्डर या कंधे का जाम होना।

क्या कहती हैं नयी रिसर्च

– डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए लाइफस्टाइल में सुधार किसी भी नयी या पुरानी दवाओ से ज़्यादा कारगर हैं।

– अगर आपको दिल के दौरे का ज़्यादा ख़तरा हैं तो कुछ दवाए बचाव की जगह नुकसान पहुचा सकती हैं।

– दिल का दौरा आने के बाद ब्लड शुगर ज़्यादा कम रखना भी ख़तरनाक हैं। ऐसे में फासटिंग ब्लड शुगर 120 और खाने के 2 घंटे बाद का ब्लड शुगर लेवल 180 से कम ना होने दे।

– नयी इंसुलिन पर रिसर्च चल रही हैं। इसे सूंघ कर या टॅबलेट के रूप में लिया जा सकता हैं। इसके आ जाने के बाद डायबिटीज के मरीज़ो की ज़िंदगी बेहद आसान हो जाएगी। लगातार ब्लड शुगर लेवल को मॉनिटर करने के लिए नया मॉनिटरिंग सिस्टम जिसे CGM कहते हैं, इंसुलिन पंप M Other नया डिवाइस हैं जिससे नियमित रूप से इंसुलिन सीधे शरीर में लिया जा सकता हैं।

इंसुलिन का इस्तेमाल

कई बार नियमित इंसुलिन की डोज लेने के बावजूद ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल से बाहर रहता हैं। ग़लतफहमी में लोग इसे बे-असर मान लेते हैं और इंसुलिन का इस्तेमाल बंद कर देते हैं। ऐसे में समस्या और गंभीर हो जाती हैं। इंसुलिन खरीदते वक़्त यह चेक करले की वह सही हैं या नही। हालांकि इसे देखकर असली-नकली का पता लगाना मुश्किल हैं। कई बार हम इंसुलिन के रंग से उसके असली-नकली का अंदाज़ा लगा सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए किसी रिजिस्टर्ड केमिस्ट से ही इसे खरीदे और इसका बिल ले। इसके साथ ही यह भी जाँच ले की इंसुलिन के स्टोरेज में टेंपरेचर के स्टैण्डर्ड का ध्यान रखा गया हैं की नही। इसकी क्वालिटी बरकरार रखने के लिए इसे 8 से 10 डिग्री टेंपरेचर पर रखना चाहिए। केमिस्ट की दुकान से घर तक लाने और घर में इसे स्टोर करने में भी टेंपरेचर का ध्यान रखना बहुत ही ज़रूरी हैं। कई बार लोग इसे स्कूटर पर दूर-दूर से गर्मी में लेकर आते हैं या गाड़ी में इंसुलिन रख लेते हैं। पार्किंग में धूप में गाड़ी खड़ी रहने से इंसुलिन खराब हो जाती हैं। सही टेंपरेचर मेनटेन ना होने की वजह से भी इंसुलिन का असर कम हो जाता हैं और इस्तेमाल करने के बावजूद आपकी समस्या बढ़ती रहती हैं। डायबिटीज को कंट्रोल में रखने के लिए डॉक्टर की सलाह पर इंसुलिन लेने से हिचकिचाए नही, क्योंकि इसके बिना आपकी समस्या बढ़कर किड्नी, लिवर, आँखो और हार्ट जैसे महत्वपूर्ण अंगो को अपनी चपेट में ले सकती हैं और आपका जीना मुश्किल भरा हो सकता हैं।

किसे पड़ती हैं इंसुलिन की ज़रूरत ?

शुगर के वह मरीज़, जिनको दिल की बीमारी हो या लकवा का अटैक आ चुका हो, आँखो की बीमारी हो, इन्फेक्शन हो, टीबी हो या ऑपरेशन होने वाला हो। डायबिटीज से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को। जब दवाओं से डायबिटीज कंट्रोल में ना आ रही हो। किसी वजह से मरीज़ सुबह या शाम को इंजेक्शन लगाना भूल जाता हैं तो मरीज़ को एक साथ 2 इंजेक्शन कभी नही लगाने चाहिए। कभी मरीज़ को लगता हैं की आज खाने पर कंट्रोल नही हो पाएगा तो वह इंसुलिन की मात्रा को बढ़ा सकता हैं।

इंसुलिन लेने का सही तरीका :-

– डायबिटीज के मरीज़ सीरिंग और इंसुलिन की शीशी की बजाए इंसुलिन पेन का इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि इसे आसानी के साथ कंही भी लिया जा सकता हैं।

– इंसुलिन का इंजेक्शन हमेशा खाने से पहले लगाना चाहिए। सुबह ब्रेकफास्ट करने से पहले और रात में डिनर करने से पहले 15-20 मिनट पहले इंसुलिन का इंजेक्शन लेना चाहिए।  2 इंजेक्शन के बीच 10 से 12 घंटो का अंतर होना ज़रूरी हैं। खाने के एकदम साथ इंसुलिन का इंजेक्शन ना लगाए, क्योंकि ऐसा करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता हैं। इंसुलिन को ठंडी और साफ जगह पर रखे।



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