भगवान तिरुपति बालाजी की कथा.

तिरुपति बालाजी की कथा. Story of Tirupati Balaji in Hindi.

आज के लेख में हम भगवान तिरुपति बालाजी की कथा (कहानी) जानेंगे। Story about Lord Tirupati Balaji In Hindi.

भगवान वेंकेटश्वर तिरुपति में निवास करते हैं। इन्हें तिरुपति बालाजी के नाम से जाना जाता हैं। लाखों-करोड़ों भक्त तिरुमाला की पहाड़ियों में बसे भगवान तिरुपति बालाजी का आशीर्वाद लेने के लिए यात्रा करते हैं। ऐसी मान्यता हैं की भगवान वेंकटेश्वर अपनी पत्नी पद्मावती के साथ तिरुमाला में रहते हैं। भगवान वेंकटेश्वर के अन्य नाम श्रीनिवास गोविंदा, वेंकट रमणा गोविन्द और बालाजी भी हैं। भारत में सबसे अमीर मन्दिरों की बात करे तो तिरुपति बालाजी का मंदिर सबसे ज्यादा अमीर हैं, जहाँ पर लाखों-करोड़ों भक्त अपनी मनोकामनाओं के पूरा होने पर हर साल करोड़ो का चढ़ावा भगवान बालाजी को अर्पित करते हैं।

भक्तों को भगवान वेंकटेशवर पर पूरा विश्वास हैं और उनका यह मानना हैं की अगर कोई भी इच्छा दिल से प्रभु से मांगी जाये तो वह भक्त की सभी इच्छाएं पूरी कर देते हैं। जिन लोगो की मन्नते पूरी हो जाती हैं, वे लोग यहाँ पर अपनी इच्छा के अनुसार अपने बाल भगवान को दान करते हैं। उत्तर भारत में रहने वाले लोग भगवान वेंकटेश्वर यानी तिरुपति बालाजी के बारे में काफी कम जानकारी रखते हैं। यहाँ तक आपमें से ज्यादातर लोगो ने तिरुपति बालाजी की कहानी भी नहीं सूनी होगी तो आइये जानते हैं श्री हरी के अवतार भगवान बालाजी की कथा।

लक्ष्मी जी का वैकुण्ठ त्यागना

एक बार ऋषि भृगु, जिनके बारे में यह कहा जाता हैं उनकी एक आँख उनके एक पैर में थी। वह सत्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए पुरे ब्रहमांड का भ्रमण करने लगे। सबसे पहले वह ब्रह्मलोक गये, जहाँ पर ब्रह्मा जी भगवान श्री विष्णु का नाम जपने में व्यस्त थे। श्रृष्टिकर्ता ब्रह्माजी को उनकी कोई आवाज़ सुनाई दी, इस पर ऋषि भृगु, ब्रह्मा जी पर क्रोधित हो गये और उन्हें श्राप दिया की अब से पृथ्वी पर उनकी कोई पूजा नहीं करेगा।

फिर उसके पश्चात ऋषि भृगु, कैलाश पर गये। जहा पर भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ वार्तालाप करने में मग्न थे। उन्होंने ने भी ऋषि पर ध्यान नहीं दिया। इस बार ऋषि भृगु ने क्रोधित हो कर भगवान शंकर को श्राप दिया की आपकी पूजा अब लिंग के रूप में होगी।

फिर उसके बाद भृगु ऋषि अपने प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए भगवान विष्णु के पास गये। भगवान विष्णु, क्षीर सागर पर शेषनाग की शैया पर सोये हुए थे। इस पर ऋषि भृगु ने क्रोधित होकर भगवान विष्णु के सीने पर जोर से अपने पैरों से वार किया। ऐसी मान्यता हैं की भगवान श्री विष्णु के ह्रदय में माता लक्ष्मी जी का निवास हैं। ऋषि भृगु को शांत करने के लिए भगवान श्री हरी ने ऋषि के पैर पकड़ लिए और उनके पैर दबाने लगे। पैर दबाते हुए भगवान विष्णु ने ऋषि भृगु के पैरों में लगे हुए नेत्र को नोच दिया। जिससे ऋषि भृगु का अहंकार नष्ट हो गया। उसके पश्चात भृगु ऋषि ने अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी। परन्तु माता लक्ष्मी भगवान विष्णु से रुष्ट हो गयी और वैकुण्ठ को छोड़ कर मृत्युलोक में चली गयी।

उसके पश्चात भगवान विष्णु लाचार होकर देवी लक्ष्मी को ढूँढने के लिए पृथ्वी पर आये। और वेंकट पहाड़ी पर इमली के पेड़ के निचे रहने लगे। इस दौरान भगवान विष्णु, लक्ष्मी जी को वापिस बुलाने के लिए ध्यान लगाने लगते हैं।

श्रीनिवास और पद्मावती का विवाह

भगवान विष्णु की पीड़ा देख कर ब्रह्मा जी और भगवान शिव,  गाय और बछड़े के रूप में धरती पर आ गये। चोल देश के राजा ने उन गाय एवं बछड़े को खरीद लिया। और उन्हें वेंकट पहाड़ी के खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया। भगवान विष्णु का पता लगा कर रोजाना गाय अपना सारा दूध भगवान श्री हरी पर बहा देती थी। जब रानी को यह ज्ञात होता है की गाय दूध नहीं दे रही हैं तो वह राजा से रुष्ट हो गयी। राजा ने फिर गाय की निगरानी करने के लिए एक व्यक्ति नियुक्त किया। जब व्यक्ति ने यह देखा की गाय अपना सारा दूध पहाड़ी पर बहा दे रही हैं तो उसने गुस्से में आकर गाय को मारने के लिए कुल्हाड़ी उठा ली। इसके पश्चात खून से लतपथ भगवान विष्णु वहा प्रगट हुए। जिसे देखकर वह व्यक्ति भय के मारे ही मर गया।

यह सब देख कर राजा दौड़ता हुआ आया। इस पर भगवान श्री हरी उसे श्राप देते हैं की वह अगले जन्म में उनके दास के रूप में एक असुर का रूप धारण करेगा। यह बात सुनकर राजा अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगा। इसके बाद भगवान विष्णु उसे माफ़ कर देते है और कहते हैं की वह अकसा राजा के रूप में जन्म लेगा। उस जन्म में वह अपनी सुंदर पुत्री पद्मावती का विवाह भगवान श्रीनिवास से करवाएगा। इस प्रकार भगवान विष्णु, श्रीनिवास का रूप ले कर वराह में निवास करने लगे। कई वर्षों के पश्चात एक अकसा नामक राजा हुआ, जिसकी पुत्री पद्मावती बहुत ही ज्यादा सुंदर थी।

भगवान श्रीनिवास ने जब देवी पद्मावती को देखा तो वह उनसे प्रेम करने लगे। राजा ने दोनों का विवाह पक्का कर दिया। भगवान विष्णु ने अपने विवाह का खर्चा उठाने के लिए धन के देवता कुबेर से ऋण लिया। तब जा कर भगवान श्री निवास और देवी पद्मावती का विवाह सम्पन्न हुआ। इसके पश्चात माता लक्ष्मी जी पूनः भगवान विष्णु के ह्रदय में समाहित हो गयी। लोग इस मंदिर में आ कर शादी भी करते हैं, उनका विशवास हैं की इस जगह पर विवाह करने से जन्मो जन्म तक रिश्ता बना रहता हैं।








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