दानवीर कर्ण के बारे में रोचक जानकारी.

Janiye Daanvir Karna ke bare mein rochak jankariyan.

कर्ण के बारे में ऐसी बातें जानिए, जिन्हें आप शायद पहले नहीं जानते थे। महाभारत में एक ऐसे योद्धा का वर्णन मिलता हैं, जो कौरवों की तरफ से लड़ते हुए भी अपनी दानवीरता के लिए पुरे भारत में प्रसिद्ध थे। जी हाँ, वह महारथी कर्ण थे, जिनकी दानवीरता की वजह से उन्हें दानवीर कर्ण भी कहा जाता हैं। कर्ण असल में पांडव ही थे। कर्ण की माता कुंती ही थी और उनके पिता सूर्य थे। लेकिन उनका पालन-पोषण रथ चलाने वाले ने किया था, इसलिए उन्हें हमेशा सूतपुत्र ही कहा गया। इसी वजह से उन्हें वह सम्मान प्राप्त नहीं हो सका, जिसके वह अधिकारी थे। आइये कर्ण से जुड़ी हुई कुछ रोचक बातें और तथ्य जानते हैं। कर्ण की कहानी सच में अपने आप में महान हैं।

द्रोपदी ने कर्ण को अपना वर चुनने से क्यों किया इंकार?

कर्ण द्रोपदी को पसंद करते थे और उनसे विवाह भी करना चाहते थे। द्रौपदी भी कर्ण से काफी ज्यादा प्रभावित थी। लेकिन फिर भी द्रौपदी ने कर्ण से विवाह करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया। सूतपुत्र होने के कारण द्रौपदी ने कर्ण से विवाह करने के लिए मना कर दिया। कर्ण को पांडवों से नफरत हो गयी।

द्रौपदी ने कर्ण से शादी इसलिए नहीं की क्योंकि वह अपने परिवार का मान-सम्मान बचाना चाहती थी। लेकिन क्या आपको पता हैं की कर्ण ने द्रौपदी से विवाह का प्रस्ताव ठुकरा देने के बाद 2 विवाह किये। आइये जानते हैं किन परस्तिथियों की वजह से कर्ण ने दो विवाह किया और कर्ण की पत्नी का क्या नाम था।

कर्ण ने की थी दो शादियाँ :-

कुंती ने कर्ण को अपनी कुंवारी अवस्था में जन्म दिया था। समाज के लोक लज्जा के भय से कुंती ने कर्ण को नदी में प्रवाहित कर दिया। कर्ण का पालन एक रथ चलाने वाले एक सारथि ने किया। इसलिए कर्ण को सूतपुत्र के नाम से समय-समय पर अपमानित किया गया। कर्ण के पालनहार पिता आधिरथ यह चाहते थे की कर्ण विवाह करे। पिता की इच्छा की पूर्ति के लिए कर्ण ने रुषाली नामक एक सुतपुत्री से विवाह कर लिया। कर्ण की दूसरी पत्नी का नाम सुप्रिया है। सुप्रिया का वर्णन महाभारत की कथा में ज्यादा देखने को नही मिलता है।

रुषाली और सुप्रिया से कर्ण के 9 पुत्र हुए। जिनके नाम यह हैं :- वृशसेन, वृशकेतु, चित्रसेन, सत्यसेन, सुशेन, शत्रुंजय, द्विपात, प्रसेन और बनसेन। कर्ण के सभी पुत्रों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया, जिसमे से 8 पुत्र मारे गये। शत्रुंजय, वृशसेन और द्विपात की मौत अर्जुन के द्वारा, प्रसेन की मृत्यु सात्यकि के हाथों से, चित्रसेन, सत्यसेन और सुशेन की मृत्यु नकुल के द्वारा और बनसेन, भीम के द्वारा मारा गया।

वृशकेतु कर्ण का एकमात्र पुत्र था जो महाभारत के युद्ध के बाद जीवित रहा। कर्ण की मृत्यु के पश्चात उनकी पत्नी रुषाली उनकी चिता के साथ सती हो गयी।

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांडवों को यह ज्ञात हुआ की कर्ण उनका ही भाई था, यानी वह भी एक पांडव था। वह उन सबसे ज्येष्ठ था। तो उन्हें इस बात से काफी ज्यादा दुःख हुआ। तब पांडवों ने कर्ण के जीवित पुत्र वृशकेतु को इन्द्रप्रस्थ की गद्दी सौंपी थी। अर्जुन के संरक्षण में वृशकेतु ने कई सारे युद्ध में भाग भी लिया।

भगवान श्री कृष्ण ने किया कर्ण का अंतिम संस्कार :-

जब कर्ण मृत्युशैया पर लेते हुए थे तो भगवान श्री कृष्ण कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए ब्राहमण भेष में कर्ण के पास गये। कर्ण ने कहा की उन्हें पास अब दान करने के लिए कुछ नहीं हैं। लेकिन जब ब्राहमण भेषधारी भगवान श्री कृष्ण बिना दान लिए वापिस जाने लगे तो कर्ण ने उन्हें रुकने के लिए कहा। फिर कर्ण ने अपने पास ही पड़े हुए पत्थर को उठाया और अपने दांतों को तोड़ दिया। कर्ण के दांत सोने के थे। भगवान श्री कृष्ण कर्ण की दानवीरता से काफी ज्यादा प्रसन्न हुए। उन्होंने कर्ण से वरदान मांगने के लिए कहा।

कर्ण ने भगवान श्री कृष्ण से कहा की एक निर्धन सूत पुत्र होने के कारण उन्हें जीवन में काफी सारे अपमान और छल देखने को मिले। इसलिए जब अगली बार भगवान अवतार लेकर धरती पर आये तो पिछड़े वर्गो का जीवन सुधारने का प्रयत्न करे। इसके साथ ही कर्ण ने 2 और वरदान भी मांगे।

दुसरा वरदान यह माँगा की अगले जन्म में भगवान श्री कृष्ण उनके ही राज्य में जन्म ले और तीसरे वरदान में उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से कहा की उनका अंतिम संस्कार ऐसी जगह पर होना चाहिए जहाँ पर कोई भी पाप न हो।

पूरी धरती पर ऐसा कोई स्थान न मिलने से भगवान श्री कृष्ण ने कर्ण का अंतिम संस्कार अपने हाथो पर किया। इस प्रकार दानवीर कर्ण मृत्यु के पश्चात साक्षात बैकुंठ को चले गये।




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