देवी-देवताओं की परिकर्मा क्यों की जाती हैं?

Devi devta ki parikarma kyon ki jati hain?

आइये जानते हैं की आखिर हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं की परिक्रमा करने का विधान क्यों हैं और मंदिर की परिक्रमा करने से क्या लाभ होता हैं।

जैसे की ज्यादातर लोग जब भी किसी मन्दिर में जाते हैं तो वह वहां पर देवी-देवताओं की पूजा करने के बाद उनकी परिक्रमा भी करते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगो को यह नहीं पता हैं की आखिर में ऐसा क्यों किया जाता हैं? परिक्रमा करने से क्या फल प्राप्त होता हैं और पूजा करने के बाद मूर्तियों की परिक्रमा क्यों करनी चाहिए?

तो इसका सीधा सा जवाब यह हैं की परिक्रमा करने से हमें उतना पुण्य प्राप्त होता हैं, जितना की आपको देवी-देवता की आराधना करने से मिलता हैं। परिक्रमा का अर्थ होता हैं आप जिस देवी-देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, मानसिक और शारीरिक रूप से आप अपने आपको उनके सामने समर्पण कर रहे हैं।

परिक्रमा लगाने का मतलब यह होता है की आप अपने इष्टदेव के पास अपने मन और तन को पूरी तरह से समर्पित करने जा रहे हैं। आपने विवाह तो जरूर देखा होगा, इसमें पति-पत्नी अग्नि के समक्ष 7 फेरे लेते हैं, मतलब की वह अग्नि की 7 बार परिक्रमा करते हैं। इसका भी विधान है देवी-देवता की, एवं मंदिर की तीन परिक्रमा करने का बहुमूल्य नियम है। तथा विद्यालय में गुरु की एक परिक्रमा का विधान है।

इसी तरह किसी भी संकल्पित धार्मिक पूजा-पाठ में आचार्य की तीन परिक्रमा का विधान है। और श्राद्ध आदि कर्म में जो भी मार्जन का जानकार, ब्राह्मण तर्पण, गायत्री जप करने वाला हो, उसको भोजन करने के बाद उसकी चार परिक्रमा का भी विधान है।

इसी तरह पीपल के पेड़ की 1, 3, 108, 101 परिक्रमा का विधान है। परिक्रमा लगाने से भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, पितृदेवों को प्रसन्न किया जाता है। वृंदावन की परिक्रमा करने से भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त होती है और आपको इष्ट कार्य की सिद्धि प्राप्त होती है।



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