पूरन भगत की रोचक कहानी जरूर पढ़े।

किस्सा पूरन भगत। पूरन भगत की कहानी। सिआलकोट का एक राजा था, सलवान, उसकी दो रानियाँ थी। एक का नाम था इछरा और दूसरी का नाम लूणा था। सलवान के घर रानी इछरा के कोख से एक बालक ने जन्म लिया। उसका नाम पूरन रखा गया।

कहते है की ज्योतिषियों ने राजा सलवान को यह भ्रम डाल दिया की बारह वर्ष तक पूरन का मुंह देखना उसके लिए अशुभ होगा। इसलिए राजा सलवान ने पूरन को बारह वर्ष तक एक कोठरी में रखने का हुक्म दिया।

बारह वर्ष बीत जाने के बाद पूरन कोठरी में से निकल कर अपने पिता राजा सलवान से मिलने के लिए गया। राजा सलवान ने पूरन को प्यार करते हुए आदेश दिया की अब वह अपनी माताओं से भी मिल आये। पहले वह लूणा से उसके महल में जाकर मिले फिर रानी इछरा से जाकर मिले।

पिता की आज्ञा के अनुसार पूरन लूणा को प्रणाम करने के लिए गया । जवान हुए पूरन की सुंदरता को देखकर लूणा दंग रह गयी। पूरन उससे माँ वाला आशीर्वाद चाहता था, परन्तु लूणा तो उल्टे पूरन पर मोहित हो गयी, वह पूरन को पुत्र की जगह प्रेमी के रूप में देखने लग पड़ी। पर पूरन की नजरो में लूणा केवल माँ ही थी। पूरन को लूणा की यह सोच देखकर निराशा हुई और वह जल्दी-जल्दी लूणा के महल से निकल आया। दूसरी ओर लूना को बहुत गुस्सा लगा की पूरन ने उसकी भावना को ठुकरा दिया है। उसने बेईज्त्ती महसूस किया और वह उससे बदला लेने के लिए उतावली हो गयी।

लूणा के महल में से पूरन के चले जाने के बाद लूणा ने एक नयी साजिश रची। उसने अपने कपड़े फाड़ लिए और अपने बाल खिलार लिए और राजा के महल में आने तक बुरा सा हाल बना कर बैठ गयी। जब राजा सलवान ने उससे इस हालत का कारण पूछा तो लूणा ने झूठी कहानी बनाते हुए रोते हुए यह बताया की पूरन माँ-पुत्र के रिश्ते की मर्यादा को भूल गया और उसकी सुंदरता को देखकर मोहित हो गया। राजा ने लूणा की झूठी कहानी को सच मान लिया और उसी समय उसने पूरन को बुलाया और पूरन की कोई बात ना सुनते हुए जल्लादो को हुक्म दिया की वह पूरन को मार कर किसी कुएं में जाकर फ़ेंक आये।

राजा की आज्ञा का पालन करते हुए जल्लाद भोले-भाले पूरन को पकड़ कर ले गए, पर उनको यह पता था की पूरन निर्दोष है। उनको मासूम पूरन के उपर दया आ गयी। सो उनहोंने उसे जान से नहीं मारा बल्कि उसके हाथ पैर काट कर उसे एक सूखे हुए कुए में फ़ेंक दिया। राजा की संतुष्टि के लिए उन्होंने पूरन के कुछ कपड़े जो लहू से लथपथ थे वह दिखा दिए।

सौभाग्यवश उस मार्ग से जोगी गोरखनाथजी और उनके चेलो की टोली वहाँ से गुजरी। उन्होंने सूखे कुए में से “हाय हाय” की दर्द भरी आवाज़ सुनी। कुएं में देखने पर उन्होंने पूरन को देखा। गुरु गोरखनाथ ने पूरन को उसके बारे में पूछा। पूरन ने अपनी आप-बीती ज्यों की त्यों बाबा गोरखनाथ को सुना दिया। गुरु गोरखनाथ ने पूरन को कहा,” मैं तुम्हारा सत्य परखने के लिए यह कच्चे सूत्र का धागा कुए में लटकाता हूँ, अगर तुम सच्चे हो तो इसे पकड़ कर कुए में से बाहर आ जाओ।” पूरन कच्चे धागे को पकड़ कर धीरे-धीरे कुएं में से बाहर आ गया। पूरन का सत्य और तेज देखकर जोगी जय-जय करने लग पड़े। तब गुरु गोरखनाथ ने पूरन के सीर पर अपना हाथ फेरा और अपनी शक्ति से पूरन को फिर पहले जैसा बना दिया और उसके हाथ पैर जोड़ दिए। इसके उपरांत पूरन ने गुरु गोरखनाथ जी से जोग धारण किया और वह एक जोगी बन गया।

गोरखनाथ जी के और चेलो की भांति पूरन भी समय-समय पर नगरों आदि में भिक्षा लेने के लिए जाता। एक बार पूरन रानी सुंदरा के महल में भिक्षा मांगने के लिए गया। रानी सुंदरा ने पूरन को देखा। वह पूरन के रूप और तेज को देखकर उस पर मोहित हो गयी। सुंदरा ने मोतियों से भरा एक थाल पूरन की झोली में डाल दिया। पूरन ने वह मोती गुरु गोरखनाथ जी के आगे ले जाकर रख दिए। गोरखनाथ जी ने पूरन से कहा,” यह मोती हमारे किसी काम के लिए नहीं है, हमे तो केवल भोजन चाहिए।” पूरन वह मोती लेकर वापिस सुंदरा के महल में पंहुचा और उसने मोतियों को वापिस करते हुए भोजन की मांग की। सुंदरा ने बाहर अच्छे पकवान तैयार करवाके खुद गोरखनाथ जी के डेरे पर पहुची। उसने बड़े प्यार से सभी जोगियों को भोजन कराया। गुरु गोरखनाथ सुंदरा की श्रध्दा देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सुंदरा से कहा की वह कोई वरदान मांग ले। सुंदरा ने कहा की अगर आप मुझपर प्रसन्न है तो अपना पूरन आप मुझे दे दे। गुरु गोरखनाथ ने पूरन को कहा की वह सुंदरा के साथ चला जाये और गृहस्थ धारण कर ले। सुंदरा खुशी-खुशी पूरन को अपने साथ लेकर अपने महल में आ गयी। परन्तु पूरन का मन बहुत दुखीः था। उसे सुंदरा के महल में रहने की कोई खुशी नहीं थी।

सुंदरा ने पूरन से कहा की आपके खुश रहने पर ही मैं खुश रह सकुंगी। पूरन ने इन सभी आडम्बरो से मुक्त रहने की बात सुंदरा को बताई। तब सुंदरा को भी अब कोई मोह ना रह गया और पूरन गुरु गोरखनाथ जी के पास वापिस आ गया।

बहुत समय बीत जाने के उपरांत एक बार पूरन जोगी के रूप में सिआलकोट में आया। तब तक पूरन एक भगत के रूप में काफी प्रसिद्ध हो चूका था। कहते है की पूरन के जाने से राजा का सुखा बाग जहा पूरन ठहरा था वह बाग हरा हो गया। रानी इछरा अपने पुत्र के वियोग में रो-रो कर अंधी हो चुकी थी। नगर में भगत के पहुचने की खबर सुनकर वह दर्शनों के लिए आई। कहा जाता है की पूरन की आवाज़ सुनकर इछरा ने उसे पहचान लिया और उसकी दृष्टि भी वापिस आ गयी।

उधर कोई संतान ना होने के कारण निराश हुई लूणा भी राजा सलवान के साथ पूरन के पास पहुची। पूरन भगत ने राजा से कहा की उसकी एक संतान तो पहले से है अब वह दुबारा संतान मांगने क्यों आया है?

पहले तो वह पलटे की उनकी पहले भी कोई संतान है, फिर लूणा ने अपना सारा दोष कबूल कर लिया और पछतावा प्रगट किया। तब पूरन ने उनको आशीर्वाद देते हुए चावलों का दाना दिया और कहा की लूणा इसे खा ले तो उनके घर एक पुत्र पैदा होगा। वह बहुत बड़ा महाबली होगा। कहते है की पूरन के आशीर्वाद से लूणा की कोख से एक पुत्र ने जन्म लिया वह राजा रसालू के नाम से प्रसिद्ध हुआ

इस मुलाकात के दौरान पूरन भगत ने राजा सलवान को अपने बारे में बता दिया। यह जान कर राजा सलवान ने पूरन को अपना राज्य सँभालने के लिए कहा। परन्तु अब पूरन के लिए इन सभी बातों के लिए कोई अर्थ नहीं रह गया था। इसलिए उसने निम्रता के साथ कहा,”मैं तो अब त्यागी हूँ। माया के इन बंधनों का मुझे अब कोई मोह नहीं है।” कुछ दिनों के पश्चात पूरन यह कहते हुए आगे चला गया- “जोगी चलते भले नगर बसते भले”।

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